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नई दिल्ली/डेस्क: सबरीमाला मंदिर प्रवेश विवाद से जुड़े अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को लंबी सुनवाई का दौर समाप्त हो गया. नौ जजों की संविधान पीठ ने लगातार 16 दिनों तक चली बहस के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस पीठ ने पांच जजों के पुराने फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई की. यह मामला केवल सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके जरिए धर्म, आस्था, संवैधानिक अधिकार और न्यायिक दखल जैसे कई बड़े सवालों पर बहस हुई. सुनवाई के दौरान अदालत में "धर्म बनाम कानून" का मुद्दा केंद्र में रहा.
आठ महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक प्रश्नों पर अपना निर्णय देगी संविधान पीठ
संविधान पीठ अब आठ महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक प्रश्नों पर अपना निर्णय देगी. इनमें सबसे अहम सवाल यह है कि क्या समीक्षा याचिका के दौरान अदालत किसी कानूनी प्रश्न को बड़ी पीठ के पास भेज सकती है. इसके अलावा यह भी तय किया जाएगा कि किसी धार्मिक संप्रदाय से संबंध न रखने वाला व्यक्ति जनहित याचिका के माध्यम से उस संप्रदाय की परंपराओं को चुनौती दे सकता है या नहीं. पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता, धार्मिक प्रथाओं की न्यायिक समीक्षा और 'नैतिकता' की व्याख्या जैसे मुद्दों पर भी विस्तार से सुनवाई की. अदालत यह स्पष्ट करेगी कि संवैधानिक नैतिकता का दायरा धार्मिक परंपराओं पर किस हद तक लागू होता है.
सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठा कि व्यक्तियों के मौलिक अधिकार और धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. अदालत इस पर भी फैसला देगी कि धार्मिक संस्थाओं को मिले अधिकार क्या संविधान के अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं या नहीं. इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 25(2)(b) में प्रयुक्त "हिंदुओं के वर्ग" शब्द की व्याख्या भी इस फैसले का अहम हिस्सा होगी. इस मुद्दे को लेकर दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क अदालत के सामने रखे.
सुनवाई के लिए पहले सात प्रमुख प्रश्न तय किए थे
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए पहले सात प्रमुख प्रश्न तय किए थे, जिनमें धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा, संवैधानिक नैतिकता, धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक समीक्षा और जनहित याचिकाओं की वैधता जैसे विषय शामिल थे. अब देशभर की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर टिकी हैं, जो न केवल सबरीमाला विवाद बल्कि भविष्य में धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मामलों की दिशा भी तय कर सकता है.
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