अरावली पहाड़ी की नई परिभाषा आई सामने, अब 100 मीटर से कम उंचाई वाली पहाड़ी नहीं ह...

अरावली पहाड़ी की नई परिभाषा आई सामने, अब 100 मीटर से कम उंचाई वाली पहाड़ी नहीं होगी इसमें शामिल, विवाद का कारण..

अरावली पहाड़ी की नई परिभाषा आई सामने अब 100 मीटर से कम उंचाई वाली पहाड़ी नहीं होगी इसमें शामिल विवाद का कारण 

न्यूज11 भारत
रांची/डेस्कः-
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों को लेकर एक नई परिभाषा गढ़ी है. बताया जा रहा है कि आसपास के जमीन से 100 मीटर उंची पहाड़ी ही अरावली मानी जाएगी. कहा जाता है कि यह नियम राजस्थान में 2003 से ही माना जाता रहा है, जो कि अमेरिकन रिसर्चर रिचर्ड मर्फी के सिद्धांत पर आधारित है. पर्यावरणविदों का डर है कि इससे छोटी पहाड़ियां संरक्षण से बाहर कर दी जाएगी और इस क्षेत्र में खनन बढ़ेगा. इसके साथ ही #SaveAravalli जैसी मुहिम सोशल मीडिया में तेज हो गई है. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार अरावली एरिया में 100 मीटर या फिर उससे अधिक उंचाई वाले पहाड़ ही अरावली पहाड़ी मानी जाएगी. ऐसी दो से ज्यादा पहाड़ियां जो एक दूसरे से 500 मीटर के दायरे में पाई जाती है वो अरावली रेंज कहलाएंगी. 

ये कहानी कोई नई नहीं है बल्कि 2002 से शुरु होती है. सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी (सीईसी) को हरियाणा के कोर्ट में अरावली को लेकर अवैध खनन की शिकायत मिली. अक्टूबर 2002 में सीइसी ने खनन रोकने का आदेश दिया. मामला सीधा सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. कोर्ट में कहा गया कि ऐसे खनन से अरावली की वजूद मिट सकता है. वहीं 30 अक्टूबर 2020 को कोर्ट ने हरियाणा व राजस्थान समेत पूरे अरावली एरिया में किसी भी तरह के खनन पर रोक लगा दी थी. 

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राजस्थान में इसे लेकर एक बड़ा संकट खड़ा हो गया, मार्बल ग्रेनाइट खनन से संबंधित जुड़े लाखों लोग बेरोजगार हो गए. उस समय के सीएम अशोक गहलोत ने कोर्ट से अपील की कि ऐसे खनन को न बंद किया जाए. क्योंकि सीधे लोग आजीविका से जुड़े हुए हैं. 2002 मे कोर्ट ने खनन को फिर से चालू करने का आदेश पारित किया लेकिन नई इकाई पर रोक लगा दी. 

100 मीटर फॉर्मूला की शुरुआत
स्थाई हल के लिए अशोक गहलोत ने एक कमिटी बनाई थी, जिस कमीटि 2003 में अमेरिकी भूआकृति विशेषज्ञ रिचर्ड मर्फी ने एक सिद्धांत अपनाया जिसमें समुद्र तल से 100 मीटर की उंचाई पहाड़ी को ही पहाड़ माना जाता है. कमेटी ने मर्फी के अन्य सिद्धांतों को नजरअंदाज कर दिया. 
अगस्त 2003 में गहलोत सरकार ने सभी जिलों को यह निर्देश दिया कि 100 मीटर से कम उंचाई वाले जगहों पर खनन की संभावनाएं तलाशी जा सकती है. वहीं 2003 में वसुंधरा राजे सरकार के आने पर इस फार्मूले को आगे बढ़ाया गया और खनन आवंटन शुरु हो गया. अप्रैल 2005 ने एक आदेश जारी किया जिसके बाद नए आवंटनों को बंद करना पड़ा. 

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राजस्थान में दुरुपयोग 
2010 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) और सीइसी के एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि राजस्थान में खनन जोरों पर है. अलवर में 2269 पहाड़ियों में से 25 प्रतिशत पहाड़ी गायब हो चुकी है. कई पहाड़ी तो पूरी तरह से खत्म हो चुकी है. इस पर कोर्ट ने स्पष्ट परिभाषा मांगी. 

सुप्रीम कोर्ट का फैसला
नबंबर 2025 में केंद्र सरकार ने मर्फी फार्मूले को आगे बढ़ाते हुए कहा कि 100 मीटर की उंचाई वाले पहाड़ी ही अरावली पहाड़ी मानी जाएगी. साथ ही उसके नीचे कंटूर लाइन के अंदर का पूरा क्षेत्र संरक्षित रहेगा. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, दिल्ली सभी जगहों के लिए एक समान रुप से लागू कर दिया. 

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इसे लेकर पर्यावरणविद और विपक्षी दल अरावली पर्वत की मौत का सजा बता रहें हैं. इसमें ज्यादातर छोटी पहाड़ियां अब संरक्षण के बाहर हो सकती है. इससे थार रेगिस्तान का फैलाव, भुमि जल के स्तर का नीचे गिरना साथ ही दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण बढ़ने का खतरा को बढ़ा सकता है. 
बता दें कि अरावली भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला है जो उत्तर भारत के जलवायु को रोकती है. अब आने वाला समय ही बताएगा कि सुप्रीम कोर्ट का परिभाषा संरक्षण को मजबूत करती है कि खनन को बढ़ावा देती है. 
 


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