मुंबई-चेन्नई समेत समंदर में समा जाएगी दुनिया की 10 करोड़ इमारतें..

मुंबई-चेन्नई समेत समंदर में समा जाएगी दुनिया की 10 करोड़ इमारतें..

कुछ देशों में अगर ज्यादा या कम होगी तो ये वहां के जमीन की बनावट पर निर्भर करेगा.

मुंबई-चेन्नई समेत समंदर में समा जाएगी दुनिया की 10 करोड़ इमारतें

न्यूज11 भारत
रांची/डेस्कः-
मैकगिल युनिवर्सिटी की एक स्टडी में कहा गया कि अगर उत्सर्जन नहीं रुका तो सदी के अंत तक 10 करोड़ इमारते समंदर में डूब जाएंगी. इससे 30 लाख लोग प्रभावित हो सकते हैं. बता दें कि भारत में मुबंई का 21.8%, चेन्नई का 18% हिस्सा पानी में चला जाएगा, लाखों लोगों की अर्थव्यव्स्था खतरे में आ सकता है. 


जलवायु परिवर्तन की वजह से समुद्र के पानी का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है. एक स्टडी के मुताबिक अगर हम जीवाश्म इंधन का इस्तेमाल न रोकें तो सदी के अंत तक दुनिया भर में 10 करोड़ से ज्यादा इमारतें पानी में डूब सकते हैं. ये इमारत तटीय शहरों के बताए जा रहे हैं, जहां लाखों लोग रहते हैं. बता दें कि मैकगिल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की ये स्टडी नेचर अर्बन सस्टेनेबिलिटी जर्नल में छपी है. पहला ऐसा रिसर्च है जिसमें अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य-दक्षिण अमेरिका के तटीय इलाकों में इमारत-दर-इमारत खतरा मापा गया है. वैज्ञानिको ने सेटेलाइट नक्से व उंचाई के आंकड़ों से अनुमान लगाया है कि अगर समुद्र का स्तर सिर्फ 0.5 मीटर बढ़ जाए तो करीब 30 लाख इमारतें डूब सकती है. 


अगर उत्सर्जन नहीं रुका और स्तर 5 मीटर से अधिक बढ़ गया तो खतरा कई गुणा बढ़ सकता है. 10 करोड़ से ज्यादा इमारतें खतरे में पड़ सकती है. ज्यादातर ये इमारते घनी आबादी वाले इलाकों की बताई जा रही है. 


इसमें पूरे मोहल्ले बंदरगाह तेल रिफाइनरी और पुरानी संस्कृति जगहें ये सारे इलाके बाढ़ के चपेट में आ सकते हैं. इस स्टडी से जुड़े प्रोफेसर नताल्या ने कहा कि समुद्र का बढ़ता स्तर जलवायु परिवर्तन का धीमा मगर पक्का नतीजा है. पहले से ये तटीय इलाके को प्रभाविक कर रहा है, और सदियों तक करता रहेगा. अगर इंधन जलाना न रुका तो ये कई मीटर तक पहुंच सकता है. 

मुंबई-चेन्नई सबसे ज्यादा खतरे में
भारत भी इससे बच नहीं पाएगा, एक दूसरी स्टडी के अनुसार अगर उत्सर्जन न रूका तो सदी के अंत तक मुंबई का 21.8% हिस्सा (1,377 वर्ग किलोमीटर) हिस्सा पानी में डूब सकता है. अभी से 830 वर्ग किलोमीटर खतरे में बताया जा रहा है. प्रोफेसर जेफ कार्डिले का कहना है कि बड़ी हैरानी वाली बात है कि थोड़े से बढ़ोत्तरी से ही इतनी इमारतें प्रभावित हो जाएगी. कुछ देशों में अगर ज्यादा या कम होगी तो ये वहां के जमीन की बनावट पर निर्भर करेगा. 

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