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रांची/डेस्क: कभी-कभी कानून सिर्फ नियम नहीं होते बल्कि समाज की दिशा और सोच को भी तय करते हैं लेकिन जब किसी नए नियम को लेकर दुनिया भर में सवाल उठने लगे तो वह सिर्फ एक देश का मुद्दा नहीं रहता बल्कि एक वैश्विक बहस बन जाता हैं.
इसी तरह एक नया फैसला इन दिनों अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है, जिसने मानवाधिकारियों, महिलाओं की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय को लेकर गंभीर चर्चा छेड़ दी हैं. यह मामला एक ऐसे देश से जुड़ा है, जहां हाल ही में लागू किए गए पारिवारिक कानून को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही है- कुछ समर्थन में तो कई कड़े विरोध में.
तालिबान शासित अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक बार फिर वैश्विक बहस तेज हो गई हैं. तालिबान सरकार ने नया 'फैमिली लॉ' लागू किया है, जिसमें शादी, तलाक, बाल विवाह और पारिवारिक विवादों से जुड़े कई नियम तय किए गए हैं. इस कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने कड़ी आपत्ति जताई हैं.
चुप्पी को माना जाएगा लड़की की सहमति
रिपोर्ट्स के मुताबिक, तालिबान सरकार द्वारा लागू किए गए नए कानून में सबसे विवादित प्रावधान यह है कि यदि कोई कुंवारी लड़की बालिग़ होने के बाद अपनी शादी के प्रस्ताव पर चुप रहती है तो उसकी चुप्पी को शादी के लिए उसकी सहमति माना जाएगा. हालांकि कानून में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यही नियम लड़कों या पहले से शादीशुदा महिलाओं पर लागू नहीं होगा यानी केवल अविवाहित लड़कियों की चुप्पी को ही 'रजामंदी' के रूप में देखा जाएगा. इसी प्रावधान को लेकर दुनियाभर में सबसे ज्यादा आलोचना हो रही हैं.
तालिबान सुप्रीम लीडर ने दी मंजूरी
31 अनुच्छेदों वाले इस नए कानून को तालिबान के सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा की मंजूरी मिलने के बाद आधिकारिक गजट में प्रकाशित किया गया. इस कानून का नाम 'पति-पत्नी के बीच अलगाव के सिद्धांत' रखा गया हैं. कानून में बाल विवाह, धर्म परिवर्तन, लापता पति, जबरन अलगाव और एडल्ट्री जैसे संवेदनशील मामलों को भी शामिल किया गया हैं.
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बाल विवाह पर पिता और दादा को विशेष अधिकार
नए कानून में 'खियार अल-बुलूग' नामक इस्लामी सिद्धांत का जिक्र किया गया हैं. इसके तहत बचपन में हुई शादी को बालिग होने के बाद रद्द करने की मांग की जा सकती है लेकिन कानून के अनुछेद 5 में यह भी कहा गया है कि अगर पिता या दादा के अलावा किसी अन्य रिश्तेदार ने नाबालिग की शादी तय की है तो भी वह शादी वैध मानी जाएगी, बशर्ते जीवनसाथी सामाजिक रूप से उपयुक्त हो. हालांकि ऐसी शादी को समाप्त करने के लिए तालिबान की अदालत से मंजूरी लेना अनिवार्य होगा.
जजों को दी गई व्यापक शक्तियां
नए नियमों के अनुसार, बाल विवाह, धर्म परिवर्तन, व्यभिचार और लंबे समय से लापता पति जैसे मामलों में तालिबान के जजों को व्यापक अधिकार दिए गए हैं. यदि किसी लड़की के अभिभावक को हिंसक या अनैतिक माना जाता है तो अदालत शादी को अमान्य घोषित कर सकती हैं. इस कानून के सामने आने के बाद महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया दी हैं. राजनीतिक विश्लेषक फ़हिमा मोहम्मद ने कहा कि बाल विवाह में सहमति जैसी कोई चीज नहीं हो सकती. उन्होंने आरोप लगाया कि लड़की की चुप्पी को उसकी मंजूरी मानना महिलाओं की स्वतंत्रता और आवाज दोनों को दबाने जैसा हैं.
2021 के बाद लगातार बढ़ी पाबंदियां
साल 2021 में अफगानिस्तान की सत्ता में वापसी के बाद से तालिबान सरकार महिलाओं पर कई सख्त नियम लागू कर चुकी हैं. महिलाओं की उच्च शिक्षा पर प्रतिबंध, सरकारी और निजी नौकरियों में रोक, सार्वजानिक स्थानों पर कड़े ड्रेस कोड और अकेले यात्रा पर सीमाएं पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का कारण बन चुकी हैं. अब नए फैमिली लॉ के बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि क्या अफगानिस्तान में महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पूरी तरह खत्म होती जा रही हैं.