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रांची/डेस्क: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने राज्य सरकार के द्वारा तैयार की गयी पेसा नियमावली पर आपत्ति जतायी है. उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर झारखंड सरकार द्वारा तैयार की गयी पेसा नियमावली के कई बिन्दुओं को पेसा की मूल आत्मा के विपरीत बताया. उन्होंने कहा कि झारखंड सरकार द्वारा बनाई गई नियमावली, पेसा अधिनियम के प्रावधानों से इतर बनायी गयी है. यह नियमावली पेसा कानून की मूल भावना के विपरीत है. जैसा कि समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ है, उसमें ग्राम सभा से अभिप्रेत है, अनुसूचित क्षेत्र के पारंपरिक ग्राम सभा क्षेत्र में परंपरा से प्रचलित रीति-रिवाज के अनुसार मान्यता प्राप्त व्यक्ति यथा -
- संथाल समुदाय – मांझी/परगना
- हो समुदाय - मुंडा/मानकी/दिउरी
- खड़िया समुदाय - ढोकलो/सोहोर
- मुंडा समुदाय - हातु/मुंडा/पड़हा राजा/पहान
- उरांव समुदाय - महतो पड़हावेल (राजा) /पहान/
- भूमिज - मुंडा/सरदार/नापा/डाकुआ
जबकि पेसा अधिनियम 1996 की धारा 4 ...
- (क) में स्पष्ट प्रावधान है कि पंचायत के बारे में कोई राज्य विधान जो बनाए जाएं, रुढ़िजन्य विधि, सामाजिक एवं धार्मिक प्रथाओं और समुदायों के संसाधनों की परंपरागत प्रबंधन पद्धतियों के अनुकूल होगा.
- (ख) ग्राम साधारणतया आवास या आवासों के समूह, पूरबां या पूरबों के समूह से मिलाकर बनेगा, जिसमें समुदाय समाविष्ट हो और जो परंपराओं तथा रूढ़ियों के अनुसार अपने कार्यकलापों का प्रबंध करता हो.
- (घ) प्रत्येक ग्राम सभा लोगों की परंपराओं और रूढ़ियों, उनके सांस्कृतिक पहचान, समुदायों के संसाधनों और विवाद निपटारे के लिए रुढ़िजन्य ढंग का संरक्षण एवं परिरक्षण करने के लिए सक्षम होगी.
- (ग) प्रत्येक ग्राम सभा की एक ग्राम सभा होगी जो ऐसे व्यक्तियों से मिलकर बनेगी जिनके नाम को ग्राम स्तर पर पंचायत के लिए निर्वाचक नियमावली में सम्मिलित किया गया है.
परंतु पेसा की धारा 4 के उपरोक्त प्रावधानों को नजरअंदाज कर दिया गया है. यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि ग्राम सभा की अध्यक्षता रूढ़िवादी परंपराओं या संबंधित जनजाति से दूसरे धर्म में शामिल हो गए या अन्य संप्रदाय के लोगों को ग्राम सभा के अध्यक्ष के रूप में मान्यता तो नहीं दी जा रही है?
पेसा कानून 1996 के अनुसार ग्राम सभा के संसाधनों लघु खनिजों, वन उत्पादों, जल स्रोतों के संबंध में सामूहिक संसाधनों के मामले में पूर्ण प्रबंधन का अधिकार ग्राम सभा को दिया गया है. देखना है लघु खनिजों, बालू घाटों एवं जल स्रोतों इत्यादि के संबंध में ग्राम सभा को वास्तव में कोई अधिकार दिया गया है कि नहीं या सरकार का पूर्ण नियंत्रण है या पूर्व की भांति ही चलता रहेगा.
अंत में पेसा अधिनियम 1996 के प्रावधान अति स्पष्ट है. अधिसूचित क्षेत्र में इन ग्राम सभा एवं पंचायत का प्रतिनिधित्व रुढ़िजन्य जनजातीय प्रधानों के द्वारा किया जाना तय किया गया है.
मैं मानता हूं कि राज्य सरकार के द्वारा कैबिनेट स्तर से नियमावली बनाकर वास्तव में राज्य की जनजाति जनसंख्या को लॉलीपॉप दिखाने अथवा उनकी आंखों में धूल झोंकने का प्रयास किया जा रहा है.
पेसा कानून में आदिवासी रूढ़िवादी व्यवस्था को मिटाने के बजाय उसे कानूनी जामा पहना कर सशक्त बनाया जाना चाहिए ताकि अपनी सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक न्याय प्रणाली और संसाधनों पर उनका नियंत्रण सुनिश्चित हो सके.
पेसा कानून का मुख्य उद्देश्य आदिवासी समुदायों की पारंपरिक प्रथाओं और रूढ़ियों को कानूनी मान्यता प्रदान करना है.
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