न्यूज 11 भारत / बिहार डेस्क
पटना - बिहार में आने वाले 20–25 वर्षों में गंभीर पेयजल संकट की आशंका जताई जा रही है। राज्य में पीने के पानी के साथ-साथ खेती और अन्य जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भरता तेजी से बढ़ रही है। चिंता की बात यह है कि जितनी तेजी से जमीन से पानी निकाला जा रहा है, उतनी गति से उसका पुनर्भरण नहीं हो पा रहा। इस असंतुलन के कारण भविष्य में जल संकट गहराने की संभावना है। इस स्थिति की पुष्टि केंद्रीय भूजल बोर्ड की हालिया रिपोर्ट में भी की गई है।
हाईलाइट्स:
- बिहार में 20–25 साल में गंभीर जल संकट की आशंका
- भूजल उपयोग 2004 के 10.77 BCM से बढ़कर 2025 में 14.47 BCM
- भूजल दोहन स्तर 50% के आसपास, कई इलाकों में तेजी से गिर रहा जल स्तर
- सुरक्षित क्षेत्रों की संख्या घटी, संकटग्रस्त और अर्ध-संकटग्रस्त क्षेत्र बढ़े
- कई जिलों में बन रहे हैं “वॉटर क्राइसिस हॉटस्पॉट”
बिहार में भूजल पर बढ़ती निर्भरता अब एक गंभीर चेतावनी का संकेत बन चुकी है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में जल उपयोग का लगभग 80–85 प्रतिशत हिस्सा सीधे भूजल स्रोतों पर निर्भर है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां पेयजल और सिंचाई का मुख्य साधन यही है।
2004 से 2025 के बीच भूजल उपयोग 10.77 बीसीएम से बढ़कर 14.47 बीसीएम हो गया, यानी लगभग 3.7 बीसीएम की अतिरिक्त खपत। अगर इसी रफ्तार से उपयोग बढ़ता रहा, तो आने वाले 20–25 वर्षों में यह आंकड़ा 18–20 बीसीएम तक पहुंच सकता है, जो उपलब्ध संसाधनों पर भारी दबाव डालेगा।
सिंचाई के क्षेत्र में स्थिति और अधिक चिंताजनक है। बिहार में कुल सिंचाई का लगभग 60–65 प्रतिशत हिस्सा ट्यूबवेल और बोरवेल के जरिए भूजल से ही होता है। खासकर धान और गेहूं जैसी फसलों में अत्यधिक पानी की जरूरत होती है, जिससे भूजल दोहन और तेज हो जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार:
- प्रति वर्ष औसतन 0.2 से 0.5 मीटर तक कई जिलों में जल स्तर गिर रहा है
- कुछ शहरी और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में यह गिरावट 1 मीटर प्रति वर्ष तक दर्ज की गई है
- गर्मियों के मौसम में कई इलाकों में जल स्तर 5 से 10 मीटर तक नीचे चला जाता है
भूजल आकलन इकाइयों (assessment units) की स्थिति भी बदल रही है:
- 2025 तक लगभग 88.04% क्षेत्र ‘सुरक्षित’ श्रेणी में हैं (जो पहले 95% से अधिक थे)
- 9.16% क्षेत्र ‘अर्ध-संकटग्रस्त’ हो चुके हैं
- लगभग 2–3% क्षेत्र ‘संकटग्रस्त’ और ‘अतिदोहन’ की श्रेणी में आ चुके हैं
शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि भी संकट को बढ़ा रहे हैं। बिहार की जनसंख्या घनत्व 1,200 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से अधिक है, जिससे प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता लगातार घट रही है। अनुमान है कि प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता 1,500 क्यूबिक मीटर से घटकर आने वाले वर्षों में 1,000 क्यूबिक मीटर के करीब पहुंच सकती है, जो ‘जल संकट’ (water stress) की श्रेणी में आता है।
इसके अलावा:
- राज्य के लगभग 70% घरों में नल-जल योजना पहुंच चुकी है, जिससे भूजल की मांग और बढ़ी है
- बारिश का लगभग 80% हिस्सा जून से सितंबर के बीच ही होता है, लेकिन उसका बड़ा भाग बहकर निकल जाता है
- भूजल रिचार्ज की दर उपयोग की तुलना में 15–25% कम आंकी गई है
इन सभी आंकड़ों से स्पष्ट है कि यदि जल प्रबंधन, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण पर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया, तो बिहार के कई हिस्सों में “लोकल वाटर क्राइसिस ज़ोन” तेजी से बढ़ सकते हैं और आने वाले दशकों में यह एक व्यापक संकट का रूप ले सकता है।
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