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रांची/डेस्कः- आजादी के वक्त अंग्रेजों ने एक तुगलकी फरमान जारी किया था. इस आदेश में सरकारी मुजालिमों को ‘गॉड सेव द क्वीन’गाना जरुरी कर दिया गया था. इसी गुस्से में बंकिम चंद्र चटोपाध्याय ने 1875 में एक गीत लिखा था वंदे मातरम गीत की रचना 7 नवंबर 1875 को की गई थी. आज ये गीत एक बार फिर से चर्चा का विषय बन गया है. भारतीय संसद में इस गीत पर 10 घंटे तक की चर्चा हुई. 1870 के दशक में भारत पर ब्रिटिश हुकुमत का दबदबा था. वहीं बंकिम चंद्र एक सरकारी नौकरी में थे. डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत थे. तभी ब्रिटिशों ने हर सरकारी कार्यक्रम में इंग्लैंड की रानी के तारीफ वाला गीत गीत’गॉड सेव द क्वीन’ को जरुरी कर दिया था. यही आदेश सुनकर बंकिम को गुस्सा आ गया था. उनको लगा कि अपने देश में ब्रिटिश रानी का जयकार बर्दाश्त से बाहर है. इसी राष्ट्रीय स्वाभिमान के जज्बे ने उन्हे प्रेरित किया था और उसी दैरान उन्होने वंदे मातरम गीत की रचना की थी. यह कविता उन्ही के मशहूर उपन्यास आनंदमठ में छपी थी, जो कि एक सन्यासी विद्रोही के कहानी पर आधारित है. उद्देश्य बिल्कुल साफ था देशभक्ति का अलख जगाना. बंकिम ने इसे संस्कृत और बंगाली दोनों मिश्रित भाषा में लिखा ताकि हर भारतीय इस गीत से जुड़ सके.
कौन थे बंकिम चंद्र?
वंदे मातरम के रचयिता बंकिम कोई साधारण आदमी नहीं थे. उनका जन्म 1838 में पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के कांठलपाड़ा गांव में हुआ था. 11 साल के उम्र में उनकी शादी हो गई थी. उन्होने पहले भारतीय के तौर पर 1857 में प्रेसीजेंसी कॉलेज से बीए किया. फिर 1869 में कानून की डिग्री हासिल की फिर तुरंत मजिस्ट्रेट भी बन गए. बंगाल में वे सचिव भी रहे. रायबहादुर जैसी उपाधियां भी हासिल की. अपने 27 साल के उम्र में पहला बंगाली उपन्यास दुर्गेश नंदनी 1865 में लिखा. बंगाली साहित्य को जनता तक पहुंचाने वाले पहले लेखक माने जाते हैं. बंकिम चंद्र को भारत का ‘एलेक्जेंडर ड्यूमा भी कहा जाता है. इस पुस्तक को उन्होने बंगाली व हिंदी दोनों में लिखा था. 1891 में सरकारी नौकरी से रिटायर हुए औऱ 1894 में 56 वर्ष के उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया. उनकी कलम 1857 के विद्रोह और सन्यासी बगावत जैसी घटनाओं को जिंदा भी रखा. वंदे मातरम गीत ने उन्हे अमर बना दिया. ये सिर्फ गीत नहीं बल्कि आजादी की संपूर्ण गाथा है.
सुभाष चंद्रबोस ने इस गीत को आईएनए का मार्चिंग सॉन्ग बनाया
अब सवाल ये है कि पहली बार ये गीत कब गाया गया था. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में 1896 कलकत्ता में पहली बार ये गीत गूंजा था. महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत में अपना सुर और ताल दिए थे और पहली बार किसी राजनीतिक मंच पर गाया गया था. 1886 के कांग्रेस सेशन में हेम चंद्र बंधोपाध्याय ने इसके दो पैरा गाए थे लेकिन टैगोर का संस्करण असली हिट साबित हुआ था. फिर धीरे धीरे क्रांतिकारियों का सबसे पसंदीदा नारा बन गया. बच्चे बूछटे नौजवान सबके मुंह में ये गीत गूंजने लगा. स्वत्ंत्रता संग्राम में ये शक्ति का स्रोत बना था. अंग्रेजों ने इसे बैन करने के बारे में भी सोचा था लेकिन नही हो सका. सुभाष चंद्रबोस ने इस गीत को आईएनए का मार्चिंग सॉन्ग बनाया.
इस गीत का शुरुआती दौ पैरा संस्कृत में है बाकी बंगाली में है. बाद में अरविंदो घोष ने इस गीत को अंग्रेजी में फिर आरिफ मोहम्मद खान ने इसे उर्दू में लिखा. आदाजी के बाद 24 जनवरी 1950 को पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि जन मन गण के साथ वंदे मातरम गीत को भी राष्ट्रीय गीत का सम्मान मिले.
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