यहां बच्चे किताबों का नहीं, पहले उफनते नाले का इम्तिहान पास करते हैं… टंगरी टोली की दर्दनाक कहानी

पुल नहीं, खतरे का रास्ता

यहां बच्चे किताबों का नहीं, पहले उफनते नाले का इम्तिहान पास करते हैं… टंगरी टोली की दर्दनाक कहानी

बारिश आते ही टापू बन जाता है टंगरी टोली, पुल नहीं होने से तीन महीने तक थम जाती है बच्चों की पढ़ाई

यहां बच्चे किताबों का नहीं पहले उफनते नाले का इम्तिहान पास करते हैं… टंगरी टोली की दर्दनाक कहानी

न्यूज़11 भारत 
सिमडेगा/डेस्क:
कहते हैं सरकार गांवों को शहरों से जोड़ रही है, लेकिन बानो प्रखंड के गंगेमेर पंचायत अंतर्गत टंगरी टोली की तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां करती है. यहां बारिश की पहली बूंद राहत नहीं, बल्कि दहशत लेकर आती है. बादल गरजते हैं तो गांव वालों के दिल भी कांप उठते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि अब उनका गांव फिर तीन महीने के लिए टापू बनने वाला है. 

हर कदम पर जान हथेली पर 
यहां नाले पर पुल नहीं है. नतीजा, हर दिन मौत को मात देकर लोग उफनते पानी को पार करते हैं. बाजार जाना हो, अस्पताल पहुंचना हो या मजदूरी करने निकलना हो, हर कदम पर जान हथेली पर रखनी पड़ती है. तेज बारिश होते ही गांव का संपर्क पूरी तरह कट जाता है और पूरा टंगरी टोली दुनिया से अलग-थलग पड़ जाता है.

तीन महीने तक पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित 
सबसे दर्दनाक तस्वीर तब सामने आती है जब मासूम बच्चे स्कूल जाने के लिए उफनते नाले में उतरते हैं. पानी थोड़ा कम हुआ तो जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंच गए, लेकिन अगर दोपहर में बारिश तेज हो गई तो वही बच्चे स्कूल में फंस जाते हैं. अभिभावक घर पर बेचैन रहते हैं और बच्चे स्कूल में. कई बार शिक्षक भी विद्यालय तक नहीं पहुंच पाते, जिससे बरसात के करीब तीन महीने तक पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित रहती है.

क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है? 
ग्रामीण बताते हैं कि वर्षों से नाले पर पुल निर्माण की मांग की जा रही है. जनप्रतिनिधि आए, आश्वासन दिया, अधिकारी आए, निरीक्षण हुआ, फाइलें चलीं… लेकिन पुल आज भी सिर्फ वादों में खड़ा है. सवाल यह है कि क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है? सरकार कहती है कि हर गांव तक विकास पहुंच गया… लेकिन टंगरी टोली पूछ रहा है, "साहब, पहले हमारे गांव तक विकास पहुंचने का रास्ता तो बना दीजिए." यहां बच्चे किताबों का नहीं, पहले उफनते नाले का इम्तिहान पास करते हैं… तब जाकर स्कूल पहुंचते हैं. लगता है टंगरी टोली के हिस्से का पुल भी चुनावी भाषणों में ही बनकर रह गया.

ग्रामीणों, शिक्षकों और स्कूली बच्चों ने एक बार फिर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि बरसों पुरानी इस समस्या का स्थायी समाधान किया जाए. क्योंकि विकास का असली मतलब भाषण नहीं, बल्कि ऐसा पुल है जो गांव को भय से आजादी दिला सके.

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