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रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग के इंजीनियरिंग सेल में लंबे समय तक संविदा पर काम करने वाले नौ कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है. कोर्ट ने इन कर्मचारियों को सेवा में वापस लेने और उनकी सेवा को नियमित करने का आदेश दिया है. सरकार को इस संबंध में छह सप्ताह के भीतर औपचारिक आदेश जारी करने को कहा गया है. न्यायाधीश दीपक रोशन की कोर्ट ने कर्मचारियों को बिना किसी औपचारिक आदेश और कारण बताए सेवा से हटाए जाने की कार्रवाई को गलत माना.
इन कर्मचारियों ने दायर की थी याचिका
मामले में धारो उरांव, अरुण कुमार साहू, गौतम प्रसाद सिंह, आशीष रंजन, प्रदीप बड़ा, विष्णु देव शाह, अरविंद कुमार सिंह, अजय कुमार रजक और संतोष कुमार राम याचिकाकर्ता थे. ये अलग-अलग पदों पर काम कर रहे थे. आदेश के अनुसार, धारो उरांव क्लर्क, अरुण कुमार साहू ड्राइवर, गौतम प्रसाद सिंह टाइपिस्ट, आशीष रंजन ऑफिस असिस्टेंट, प्रदीप बड़ा ड्राइवर, विष्णु देव शाह पंप ऑपरेटर, अरविंद कुमार सिंह ड्राइवर, अजय कुमार रजक ड्राइवर और संतोष कुमार राम ड्राइवर के पद पर काम कर रहे थे.
इन कर्मचारियों की नियुक्तियां 2004 से 2008 के बीच हुई थीं. वे स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग के इंजीनियरिंग सेल में संविदा पर काम कर रहे थे. उनकी सेवा समय-समय पर विभागीय समिति की मंजूरी के बाद बढ़ाई जाती रही. कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, इन कर्मचारियों ने बिना किसी लंबे अंतराल के 10 साल से अधिक समय तक काम किया. जनवरी 2017 तक उन्हें वेतन और भत्ते भी मिलते रहे. इसके बाद उन्हें काम करने की अनुमति नहीं दी गई.
पहले भी हाईकोर्ट से मिला था आदेश
कर्मचारियों ने पहले भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. 4 फरवरी 2017 को हाईकोर्ट ने उनकी सेवा नियमित करने की दिशा में कार्रवाई करने का आदेश दिया था. राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती दी, लेकिन उसकी अपील 9 अप्रैल 2018 को खारिज हो गई. इसके बाद कर्मचारियों ने दोबारा हाईकोर्ट का रुख किया. 15 जनवरी 2024 को अदालत ने सरकार के पुराने आदेश को रद्द करते हुए कर्मचारियों के मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आधार पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया था.
सरकार ने नियमित करने से किया था इनकार
इसके बाद भवन निर्माण विभाग ने 14 अगस्त 2024 को अलग-अलग आदेश जारी कर कर्मचारियों को नियमित करने से इनकार कर दिया. विभाग का कहना था कि उनकी नियुक्तियां स्वीकृत पदों पर नहीं हुई थीं, सक्षम अधिकारी से नियुक्ति की मंजूरी नहीं ली गई थी और नियुक्ति की जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ था.
हाईकोर्ट ने सरकारी दलील को नहीं माना
हाईकोर्ट ने सरकारी रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि कर्मचारियों की नियुक्ति को विभाग के प्रधान सचिव की मंजूरी मिली थी. इसके अलावा विभाग के मुख्य अभियंता के 28 अप्रैल 2016 के पत्र से भी यह सामने आया कि कर्मचारी स्वीकृत पदों पर काम कर रहे थे. इसलिए सरकार की ओर से उठाई गई आपत्तियां उसके अपने रिकॉर्ड से मेल नहीं खातीं. कोर्ट ने यह भी कहा कि कर्मचारियों ने 10 साल से ज्यादा समय तक लगातार काम किया और उनके खिलाफ कोई शिकायत सामने नहीं आई.
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी को सिर्फ इसलिए नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता क्योंकि उसने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है. कर्मचारियों को बिना कोई नोटिस दिए और बिना औपचारिक आदेश के काम से हटाना गलत है. अदालत ने कहा कि इन कर्मचारियों की नियुक्ति को पूरी तरह गलत नहीं माना जा सकता. लंबे समय तक काम करने और स्वीकृत पदों पर सेवा देने के तथ्यों को देखते हुए उनकी सेवा नियमित की जानी चाहिए.
6 हफ्ते में बहाली का आदेश
हाईकोर्ट ने 14 अगस्त 2024 के उन सभी आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके जरिए कर्मचारियों को नियमित करने से इनकार किया गया था. अदालत ने भवन निर्माण विभाग को निर्देश दिया कि सभी याचिकाकर्ताओं को सेवा में वापस लिया जाए और उनकी सेवा नियमित करने का औपचारिक आदेश जारी किया जाए. इसके लिए अधिकतम छह सप्ताह का समय दिया गया है. मामले में याचिका स्वीकार कर ली गई और लंबित आवेदन भी समाप्त कर दिए गए.