न्यूज 11 भारत / बिहार डेस्क
राहुल कुमार / शेरघाटी - करीब 200 साल पहले एक ‘आने’ को लेकर हुआ मामूली विवाद आज बिहार के तीन गांवों की पहचान बन चुका है। गया जिले के आमस प्रखंड स्थित सुकराडीह, बाघमारा और बागबेड़ा गांवों में दहेज जैसी कुप्रथा पूरी तरह खत्म हो चुकी है। इन गांवों में पिछले 71 वर्षों से दहेज से जुड़ा एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ है।
सुकराडीह गांव के पूर्व मुखिया रामचंद्र सिंह भोक्ता बताते हैं कि सदियों पहले एक शादी में दहेज की रकम में ‘एक आने’ को लेकर विवाद हुआ था। इस छोटी सी घटना ने इतना बड़ा रूप लिया कि गांव के पूर्वजों ने तत्काल फैसला किया—अब न कोई दहेज देगा, न लेगा। तभी से यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।
आज भी सख्ती से लागू है नियम
गांव में यदि कोई दहेज लेने या देने की कोशिश करता है, तो पंचायत बैठती है और दोषी को सजा दी जाती है। सामाजिक बहिष्कार तक का प्रावधान है, हालांकि सुधार का मौका भी दिया जाता है। यही कारण है कि यहां यह नियम आज भी पूरी सख्ती से लागू है।
1955 के बाद नहीं आया कोई केस
इन तीनों गांवों में 1955 के बाद से दहेज उत्पीड़न या लेनदेन का एक भी मामला सामने नहीं आया है। जहां पूरे बिहार में दहेज हत्या और उत्पीड़न के हजारों केस दर्ज होते हैं, वहीं ये गांव एक अलग मिसाल पेश करते हैं। यहां शादियां बेहद सादगी से होती हैं। बारात में सीमित लोग जाते हैं, और किसी तरह का तिलक, शगुन या लेनदेन नहीं होता। यहां तक कि रिश्ते तय होने के समय भी कोई उपहार नहीं दिया जाता।
गरीब बेटियों की भी होती है शादी
समाज की खास बात यह है कि संपन्न परिवारों के लड़के गरीब घर की बेटियों से बिना दहेज शादी करते हैं। अगर किसी परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो, तो गांव के लोग मिलकर शादी की जिम्मेदारी उठाते हैं। गांव के लोगों का मानना है कि शिक्षा ने भी इस परंपरा को मजबूत किया है। आज गांव के कई युवा सरकारी नौकरियों में हैं, लेकिन उन्होंने भी बिना दहेज शादी कर समाज के नियमों का पालन किया है।
समाज की एकजुटता ही ताकत
भोक्ता समाज के लोग हर साल गांव में बैठक करते हैं, जहां सामाजिक बुराइयों को खत्म करने और शिक्षा को बढ़ावा देने पर चर्चा होती है। यही एकजुटता इस परंपरा को जीवित रखे हुए है। जहां एक ओर बिहार में दहेज के कारण हर साल हजारों महिलाएं प्रताड़ित होती हैं, वहीं ये तीन गांव साबित करते हैं कि अगर समाज ठान ले, तो कुप्रथाओं को जड़ से खत्म किया जा सकता है।
गांव के लोग कहते हैं कि अगर अन्य समाज भी विवाह को सादगी और समानता के साथ अपनाएं, तो दहेज जैसी कुप्रथा खत्म हो सकती है। इसके लिए किसी कानून से ज्यादा जरूरी है—समाज की सोच में बदलाव।
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