स्त्रीधन

बैंक लॉकर में रखे स्त्रीधन पर पत्नी का हक, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रखा बरकरार

कोर्ट ने कहा क विवाह के दौरान पत्नी को मिले आभूषण और अन्य उपहार उसकी व्यक्तिगत एवं पूर्ण संपत्ति हैं.

By : Dipali Kumari
बैंक लॉकर में रखे स्त्रीधन पर पत्नी का हक, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रखा बरकरार

न्यूज़11 भारत 
रांची/डेस्क:
झारखंड हाईकोर्ट ने स्त्रीधन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि विवाह के दौरान पत्नी को मिले आभूषण और अन्य उपहार उसकी व्यक्तिगत एवं पूर्ण संपत्ति हैं. यदि वे संयुक्त बैंक लॉकर में रखे गए हों, तब भी पत्नी के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता. हाईकोर्ट ने बोकारो फैमिली कोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए पति की ओर से दायर प्रथम अपील को खारिज कर दिया.

न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया. हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने गवाहों के बयानों और कागजी सबूतों की जांच बिल्कुल सही तरीके से की थी, इसलिए उसके फैसले में कोई कानूनी गड़बड़ी या कमी नहीं है.

क्या था मामला ?

पत्नी ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वर्ष 2014 में विवाह के दौरान उन्हें मायके और ससुराल पक्ष से करीब 25 लाख रुपये मूल्य के सोने-चांदी के आभूषण उपहार स्वरूप मिले थे. विवाह के बाद सुरक्षा के उद्देश्य से इन आभूषणों को यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, बोकारो स्टील सिटी शाखा के संयुक्त लॉकर संख्या GB-69 में रखा गया था. लॉकर का संचालन पति या पत्नी, दोनों में से कोई भी कर सकता था. बाद में दहेज प्रताड़ना के कारण उन्हें ससुराल छोड़ना पड़ा और उनका स्त्रीधन लॉकर में ही रह गया. कई बार मांग करने के बावजूद पति ने आभूषण वापस नहीं किए.

पत्नी का आरोप था कि उन्होंने बैंक को भी लॉकर के संचालन पर रोक लगाने के लिए आवेदन दिया और कानूनी नोटिस भेजा, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई.उन्हें आशंका थी कि उनके स्त्रीधन का दुरुपयोग किया जा सकता है.

वहीं पति ने अदालत में दावा किया कि पत्नी अपना पूरा स्त्रीधन पहले ही अपने साथ ले जा चुकी है. उनके अनुसार, बैंक लॉकर में रखे आभूषण उनकी मां, बहन और अन्य परिजनों के हैं. उन्होंने यह भी कहा कि पत्नी ने विभिन्न मुकदमे दर्ज कर उन्हें और उनके परिवार को परेशान करने के उद्देश्य से यह वाद दायर किया है.

पति ने नहीं दिया कोई साक्ष्य

हाईकोर्ट ने गवाहों की गवाही और दस्तावेजों का विश्लेषण करते हुए पाया कि विवाह के बाद संयुक्त बैंक लॉकर खोला गया था. पति ने स्वयं स्वीकार किया कि लॉकर की चाबी उसके पास रहती थी और लॉकर का संचालन उसी के द्वारा किया जाता था. वहीं, पासबुक पत्नी के पास थी. अदालत ने यह भी पाया कि पति अपने इस दावे के समर्थन में कोई विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके कि लॉकर में रखे आभूषण उनके परिजनों के थे.

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पति ने अपने भाई, बहन या अन्य परिजनों को गवाह के रूप में पेश नहीं किया, जबकि वही लोग कथित रूप से उन आभूषणों के मालिक बताए गए थे.इससे उनके दावे की विश्वसनीयता कमजोर हुई.

हाईकोर्ट का फैसला

खंडपीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट का निर्णय पूरी तरह साक्ष्यों पर आधारित है और उसमें किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है.अदालत ने माना कि संयुक्त लॉकर में रखा पत्नी का स्त्रीधन उसकी पूर्ण संपत्ति है.इसलिए पति या अन्य किसी व्यक्ति को पत्नी की जानकारी या सहमति के बिना लॉकर संचालित करने का अधिकार नहीं है.अदालत ने पति की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा.

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