अरुण कुमार यादव/न्यूज11 भारत
गढ़वा/डेस्क: गढ़वा जिले के श्री बंशीधर नगर झारखण्ड राज्य के उत्तर पश्चिम में स्थित गढ़वा जिला छोटानागपुर का एक अहम हिस्सा रहा है, इस जिले से झारखण्ड राज्य के पलामू जिले और अन्य तीन राज्यों जैसे बिहार के रोहतास, उत्तर प्रदेश का सोनभद्र और छत्तीसगढ़ का सरगुजा जिले की सीमाएं लगती हैं इसलिए इसे गेटवे ऑफ़ छोटानागपुर कहा जाता है,झारखंड की राजधानी रांची से गढ़वा जिले का मुख्यालय की दूरी 205 किलोमीटर है गढ़वा जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर पश्चिम में मिर्जापुर सड़क मार्ग पर उत्तर प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के संगमस्थल और रांची- चोपन रेललाइन पर स्थित है श्री बंशीधर नगर एक अनुमंडल भी है, जहाँ पर सम्पूर्ण विश्व में अनुपम शताब्दियों प्राचीन श्री वंशीधर श्रीकृष्ण की साढ़े चार फ़ीट ऊँची और बत्तीस मन स्वर्णिम निर्मित एक मोहक प्रतिमा अवस्थित है यह अद्भुत प्रतिमा भूमि में गड़े शेषनाग के फन पर निर्मित चौबीस पंखुड़ियों वाले विशाल कमल पर विराजमान है. यहाँ जन्माष्टमी के मौके पर हजारों हजार श्रद्धालुओं की भी उमड़ती हैं जहाँ वृन्दावन के बाद वह मनमोहक दृश्य गढ़वा जिले के श्री बंशीधर नगर के श्री बंशीधर मंदिर में ही होती है. नगर उंटारी राज परिवार के संरक्षण में यह श्री वंशीधर मंदिर देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहा है,कई दशकों से यहाँ प्रतिवर्ष फागुन महीने भर यहाँ आकर्षक एवं विशाल मेला लगता आ रहा है.
मंदिर के प्रस्तर लेख और उसके पुजारी के अनुसार स्व० सिद्देश्वर तिवारी केद्वारा लिखित इतिहास के अनुसार सम्वत 1674 में नगर उंटारी के महाराज भवानी सिंह की विधवा रानी शिवमानी कुवंर ने लगभग बीस किलोमीटर दूर शिवपहरी पहाड़ी में दबी पड़ी इस कृष्ण प्रतिमा के बारे में स्वप्न देख कर जाना. रानी शिवमानी कुँवर कृष्ण भक्त,धर्मपरायण, और भगवत भक्ति में पूर्ण निष्ठावान थीं. साथ ही वे राज काज का संचालन भी कर रही थीं. बताया जाता है कि एक बार जन्माष्टमी व्रत धारण किये रानी साहिबा को मध्य रात्रि में स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन हुआ था स्वप्न में ही श्री कृष्ण ने रानी से वर मांगने को कहा रानी ने भगवान श्री कृष्ण से कहा कि प्रभु आपकी सदैव कृपा हम पर बनी रहे तब श्री कृष्ण ने कहा कि कनहर नदी के किनारे शिवपहरी पहाड़ी में उनकी प्रतिमा गड़ी है तुम आकर मुझे यहाँ से मुझे अपनी राजधानी में ले जाओ साथ ही उन्हें सपने में श्री वंशीधर श्रीकृष्ण की इसी प्रतिमा के दर्शन भी हुए भगवत कृपा जानकर रानी ने अगले दिन सुबह यह बात राज परिवार के लोगों को बताई और रानी की भक्ति पर लोगों को विश्वास था, राज परिवार ने एक सेना प्रतिमा को खोजने के लिए भेज दी रानी भी उस सेना के साथ-साथ गयी थीं विधिवत पूजा अर्चना के बाद रानी की सेना ने शिवपहरी पहाड़ी में रानी के कहे अनुसार खुदाई की तो श्री वंशीधर श्रीकृष्ण की अद्वितीय प्रतिमा मिली. जिसे हाथी पर बैठाकर श्री बंशीधर नगर उंटारी लाया गया जहाँ रानी इस प्रतिमा को अपने गढ़ में स्थापित कराना चाहती थीं परन्तु श्री नगर उंटारी गढ़ के मुख्य द्वार पर पहुँचते ही हाथी बैठ गया लाख प्रयत्न के बावजूद हाथी नहीं उठने पर रानी ने राजपुरोहितों से मशवरा कर वहीँ पर मंदिर का निर्माण कराया, पहले केवल प्रतिमा बंशीधर श्रीकृष्ण की ही थी. इसलिए बनारस से श्री राधा-रानी की अष्टधातु की प्रतिमा बनवाकर मंगाया गया और उसे भी मंदिर में श्रीकृष्ण के साथ स्थापित कराया गया.
इतिहासकार ऐसा अनुमान लगाते हैं कि यह प्रतिमा मराठो के द्वारा बनवाई गई होगी जिन्होंने वैष्णव धर्म का काफी प्रचार किया था और मूर्तियाँ भी बनवाई थीं,मुगलों के आक्रमण से बचाने के लिए मराठों ने इसे शिवपहरी पहाड़ी के कंदराओं में छुपा दिया गया था. वहीं इस श्री बंशीधर नगर मंदिर में 1760 के आस पास एक चोरी भी हुई थी जिसमें भगवान बंशीधर की बांसुरी और छत्र चोर चुरा के ले गए थे जिसे उन्होंने पास के ही बांकी नदी में छुपा दिया था चोरी करने वाले अंधे हो गए थे उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया परन्तु चोरी की हुई वस्तुएं बरामद नहीं हो पायीं बाद में राज परिवार ने दुबारा स्वर्ण बांसुरी और छतरी बनवा कर मंदिर में लगवाया
साठ एवं सत्तर के दशक में बिरला ग्रुप ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था आज भी श्री वंशीधर की प्रतिमा कला के दृष्टिकोण से अतिसुन्दर एवं अद्वितीय है. बिना किसी रसायन के प्रयोग या अन्य पोलिश के प्रतिमा की चमक पूर्ववत है तो कभी आइये और बंशीधर श्रीकृष्ण की मनोहारी छवि के दर्शन करने. साथ ही पूर्व में आंतकियो द्वारा वंशीधर की प्रतिमा की चोरी करने की साजिश की खबर आने के बाद मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था व मंदिर की पहचान की खबर देश के अलावे अन्य देशो मे भी फैला. वहीं पिछले कई वर्षों से राज्य सरकार द्वारा महोत्सव कराकर बॉलीवुड व हॉलीवुड के कलाकारो द्वारा कार्यक्रम प्रस्तुत करने के बाद से वंशीधर मे बाहरी पर्यटको का आने का सिलसिला प्रतिदिन देखा जाता है, वहीं जन्माष्टमी एवं शिव रात्रि महापर्व के अवसर पर विश्व विख्यात वंशीधर मंदिर मे एक माह तक लगने वाला मेला की तैयारी जोरो पर रहती है. मेला परिसर मे दुकाने भारी तादात में सजने लगती है. मेले की तैयारी के लेकर मंदिर ट्रस्टी के सदस्य तनमन से कार्य कर रहते हैं. बताया जाता है कि शिव रात्रि पर्व के अवसर पर मंदिर को आर्कर्षित रूप से सजाया जाता है तथा मंदिर के विद्वान पंडितो द्वारा पुजन अर्चन की जाती है. मेला आयोजन के दौरान झारखंड से सटे उतरप्रदेश, छतीसगढ, मध्यप्रदेश, बिहार, सहित अन्य राज्यो से श्रद्धालुओ की भीड मंदिर मे पुजन अर्चन करने आते है. यहाँ भी मान्यता है की जो भी श्रद्धालू सच्चे दिल से मन्नत मांगते हैं उनकी हर मनोकामना पूर्ण होती है.
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