संतोष श्रीवास्तव/न्यूज़ 11भारत
पलामू/डेस्क: पलामू जिले के लेस्लीगंज में सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण, पक्के निर्माण, रसीद कटने और खरीद-बिक्री के आरोपों ने अब गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्ष 2013-14 में जिन जमीनों को सरकारी दर्ज बताया जाता था, उन्हीं में से कुछ जमीनों की बाद के वर्षों में रसीद काटे जाने और खरीद-बिक्री किए जाने की बात सामने आ रही है. आरोप है कि वर्ष 2015 के आसपास ऐसी जमीनों की रजिस्ट्री भी हुई और अब उसी इलाके में पक्के निर्माण कर दुकानों को किराये पर लगाने का सिलसिला चल रहा है.
मामले की निष्पक्ष जांच हो तो पुराने राजस्व रिकॉर्ड से लेकर वर्तमान जमाबंदी, रसीद और रजिस्ट्री तक की पूरी कड़ी सामने आ सकती है. हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही संभव है.
2014-15 में सरकारी जमीन, फिर कैसे शुरू हुई खरीद-बिक्री?
स्थानीय लोगों के अनुसार वर्ष 2014-15 में सरकारी दर्ज रही जमीन बाद में कथित तौर पर निजी उपयोग में आने लगी. इसके बाद रसीद कटने और खरीद-बिक्री का सिलसिला शुरू होने की बात कही जा रही है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारी दर्ज भूमि की प्रकृति और रिकॉर्ड में बदलाव किस प्रक्रिया के तहत हुआ?
यदि जमीन सरकारी थी तो बाद में उसकी रसीद किस आधार पर काटी गई और उसकी खरीद-बिक्री कैसे संभव हुई? प्रशासन यदि पुराने और वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड का मिलान कराए तो इस पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है.
2015 की रजिस्ट्री बन सकती है जांच की अहम कड़ी
बताया जा रहा है कि वर्ष 2015 में भी ऐसी जमीनों की खरीद-बिक्री और रजिस्ट्री हुई है, जिन्हें लेकर अब सवाल उठ रहे हैं. स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि लेस्लीगंज के कुछ जिम्मेदार एवं प्रभावशाली लोगों ने ऐसी जमीनों की रजिस्ट्री कराई है.
ऐसे में जांच का दायरा केवल वर्तमान कब्जे तक सीमित नहीं होना चाहिए. वर्ष 2015 की रजिस्ट्री, उस समय उपलब्ध भूमि रिकॉर्ड, रसीद, जमाबंदी और रजिस्ट्री में प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच की जाए तो यह स्पष्ट हो सकता है कि जमीन का स्वरूप कब और कैसे बदला.
सरकारी जमीन पर अब पक्की दुकानें, किराये पर लगाने का आरोपl
इधर लेस्लीगंज बाजार में सरकारी जमीन पर कथित तौर पर पक्के निर्माण का काम भी शुरू होने की बात सामने आ रही है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई जगह दुकानें बनाकर उन्हें किराये पर लगाया जा रहा है.
सवाल यह है कि यदि भूमि सरकारी है तो उस पर पक्का निर्माण करने और दुकान को किराये पर लगाने का अधिकार किसे मिला? निर्माण सामग्री, मजदूर और लगातार चलने वाले निर्माण कार्य के बावजूद संबंधित विभाग की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ी?
क्या प्रशासन को जानकारी नहीं थी या जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई? यह सवाल अब बाजार में चर्चा का विषय बना हुआ है.
अतिक्रमण हटाया गया था, फिर दोबारा कैसे खड़ा हो गया इमारत ?
लेस्लीगंज में पूर्व में भी अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई हो चुकी है. उस समय सरकारी एवं सड़क की जमीन से अतिक्रमण हटाकर बाजार को अतिक्रमण मुक्त कराने का दावा किया गया था. लेकिन अब दोबारा पक्के निर्माण और कब्जे के आरोप सामने आने से उस कार्रवाई की स्थायित्व पर भी सवाल उठने लगे हैं.
लोगों का कहना है कि यदि सरकारी जमीन की नियमित निगरानी होती तो दोबारा अतिक्रमण की स्थिति पैदा ही नहीं होती.
शहीद नीलांबर-पीतांबर की शहादत की भूमि भी नहीं बची
इसी बीच लेस्लीगंज में 1857 की क्रांति के महान योद्धा नीलांबर-पीतांबर की शहादत से जुड़ी भूमि को लेकर भी गंभीर चिंता सामने आई है. जिस भूमि को ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए था, वह भी कथित अतिक्रमण की चपेट में बताई जा रही है.
भाकपा माले निलांबर पीताम्बरपुर सतबरवा प्रखंड सचिव कमेश सिंह चेरो सहित कई समाजसेवीयों की ओर से लंबे समय से उक्त भूमि को सार्वजनिक करने, अतिक्रमण से मुक्त कराने और शहीदों की स्मृति में संरक्षित करने की मांग उठाई जाती रही है. इसके बावजूद अब तक ठोस कार्रवाई नहीं होने से लोगों में नाराजगी है.
एक ओर शहीदों की स्मृति में सरकारी स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, दूसरी ओर उनकी शहादत से जुड़ी भूमि की सुरक्षा पर सवाल खड़े हों तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है.
सरकारी जमीन से शहीदों की भूमि तक, अब जांच की जरूरत
लेस्लीगंज में उठ रहे इन सवालों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय पूरे मामले की समग्र जांच की जरूरत है. वर्ष 2014-15 के पुराने रिकॉर्ड से लेकर 2015 की खरीद-बिक्री, उसके बाद काटी गई रसीद, जमाबंदी, रजिस्ट्री और वर्तमान में चल रहे निर्माण कार्य तक की पूरी कड़ी की जांच होनी चाहिए.
जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि जमीन का वास्तविक सरकारी रिकॉर्ड क्या था, उसमें कब और किस आधार पर परिवर्तन हुआ तथा किन लोगों के नाम पर जमीन का हस्तांतरण या रजिस्ट्री हुई.
- 2013-14 में सरकारी दर्ज जमीन आज निजी कैसे हो गई?
- 2015 में ऐसी जमीन की खरीद-बिक्री और रजिस्ट्री किस आधार पर हुई?
- बाद में रसीद किसके आदेश और किस प्रक्रिया के तहत काटी गई?
- सरकारी जमीन पर पक्के निर्माण की अनुमति किसने दी?
- दुकानों को किराये पर लगाने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- शहीद नीलांबर-पीतांबर की शहादत से जुड़ी भूमि को अब तक सार्वजनिक और संरक्षित क्यों नहीं किया गया?
इन सवाल के जवाब अब लेस्लीगंज की जनता चाहती है.
यदि आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल अतिक्रमण का मामला नहीं, बल्कि सरकारी भूमि के रिकॉर्ड, खरीद-बिक्री और कथित हेराफेरी की गंभीर जांच का विषय है. प्रशासन को पुराने राजस्व रिकॉर्ड और वर्तमान दस्तावेजों की जांच कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए.
सरकारी जमीन किसी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं और शहीदों की भूमि किसी कीमत पर उपेक्षा की शिकार नहीं होनी चाहिए. अब देखना यह है कि प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर सच सामने लाता है या फिर सरकारी जमीन पर पक्की इमारतें खड़ी होने और ऐतिहासिक भूमि के अस्तित्व पर संकट आने के बाद भी मामला फाइलों में ही दबा रह जाता है.
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