आशिष शास्त्री/न्यूज11 भारत
सिमडेगा/डेस्क: भारत के चुनावी इतिहास में अक्सर आपने वोटर को धूप में लाइन लगाए और सिस्टम के चक्कर काटते देखा होगा. लेकिन इस वक्त देश के नक्शे पर एक ऐसा जिला भी है, जहाँ पूरा का पूरा सरकारी तंत्र अपनी साहबगीरी भूलकर जनता के मिजाज में ढल चुका है.
झारखंड के दक्षिणी छोर पर बस सिमडेगा जिला जहां नियम कायदे और औपचारिकताओं की मेज-कुर्सी पीछे छूट चुकी है, और जहाँ जगह मिली, वहीं भारत सरकार का दफ्तर खुल रहा है. यहाँ तक कि चायखानों का भी बदला मिजाज, बहस का भी बदल चुका है टॉपिक.सिमडेगा में इन दिनों एसआईआर अभियान वीआईपी प्रोटोकॉल की चारदीवारी तोड़कर कभी जमीन पर बिछी चटाई पर जा बैठता है, तो कभी आंगन में रखे लकड़ी के पीढ़े पर. चौक-चौराहों पर यह अभियान किसी शौकीन युवा की बुलेट और स्कूटी की सीट को ही चलता-फिरता हाईटेक दफ्तर बन जाता है.
जिला निर्वाचन पदाधिकारी सह डीसी कंचन सिंह के नेतृत्व में मैदान में उतरे बीएलओ और निर्वाचन कर्मचारियों का जज्बा किसी जुनून जैसा है. सुदूर देहातों में अगर कोई वृद्ध पीढ़ा या चटाई पर बैठा मिलता है तो कर्मचारी जमीन पर बैठकर उनके प्रपत्र भरने लगते है. वहीं बैठने की जगह नहीं मिलती तो बीएलओ अपने बाइक या स्कूटी की सीट को ही राइटिंग पैड बना देते हैं.प्रशासन के बेहद आत्मीय अंदाज का असर यह यह हुआ हुआ है कि जनता इस अभियान को कोई नीरस सरकारी मजबूरी नहीं बल्कि अपने घर का मांगलिक उत्सव और अपनी प्रतिष्ठा का सवाल मान बैठी है.
धीरे धीरे लोग खेत का काम बीच में छोड़ या दुकानदारी रोक एसआईआर उत्सव का हिस्सा बन रहे हैं. जब देश का सबसे बड़ा अभियान इतने दिलचस्प और घरेलू अंदाज में चलाया जाए तो आंकड़े तो रिकॉर्ड तोड़ेंगे ही.
सिमडेगा और कोलेबिरा, दोनों विधानसभा क्षेत्रों को मिलाकर अब तक दो लाख से भी अधिक प्रपत्र बांटे जा चुके हैं और तकनीकी टीम ने डिजिटल क्रांति लाते हुए लगभग डेढ़ लाख प्रपत्रों का डिजिटाइजेशन भी पलक झपकते ही पूरा कर लिया है.
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