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रांची/डेस्क: झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य में वर्षों से संविदा या पीस-रेट पर काम कर रहे कर्मचारियों के हक में एक बड़ा फैसला सुनाया है. हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकार लंबे समय तक सेवा लेने के बाद यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकती कि पद स्वीकृत नहीं हैं; स्वीकृत पद आसमान से नहीं टपकते, बल्कि सरकार को जरूरत के आकलन के आधार पर इनका सृजन करना होता है. न्यायाधीश अनुभा रावत चौधरी की एकल पीठ ने दुमका बंदोबस्त कार्यालय में पिछले 20 से अधिक वर्षों से कार्यरत 'सफाई मुहर्रिर' तारा पोदो सोरेन एवं अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया.
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता दुमका बंदोबस्त कार्यालय में राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के तहत सफाई मुहर्रिर के रूप में वर्ष 1993, 1997 और 2001 से लगातार काम कर रहे हैं. इनकी नियुक्ति बकायदा विज्ञापन जारी होने और चयन प्रक्रिया के बाद हुई थी, लेकिन इन्हें नियमित वेतनमान के बजाय पीस-रेट (प्रति 200 प्लॉट ₹250) के आधार पर भुगतान किया जा रहा था. जब इन कर्मचारियों ने सरकार की नियमावली के तहत सेवा नियमितीकरण (Regularization) की मांग की, तो दुमका उपायुक्त कार्यालय ने 6 अप्रैल 2023 को उनकी फाइल यह कहकर लौटा दी कि बंदोबस्त कार्यालय में ये पद स्वीकृत नहीं हैं, इसलिए इन्हें नियमित नहीं किया जा सकता. इस अस्वीकृति के खिलाफ कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
सुनवाई के दौरान कोर्ट की अहम टिप्पणियां
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध 'निहाल सिंह बनाम पंजाब राज्य' मामले का हवाला देते हुए कहा कि दशकों तक बड़ी संख्या में लोगों की सेवाएं लेने के बाद राज्य का यह बचाव पूरी तरह अनुचित है कि उन्हें समाहित करने के लिए स्वीकृत पद नहीं हैं. पद सृजित करना राज्य का नीतिगत निर्णय और विवेक है. अदालत ने माना कि यदि कोई कर्मचारी 20 साल से अधिक समय से भू-अभिलेख (Land Records) तैयार करने जैसे संवेदनशील और आवश्यक कार्य में लगातार लगा हुआ है, तो इसका मतलब है कि यह कार्य स्थायी और निरंतर प्रकृति का है. ऐसे महत्वपूर्ण काम को बिना बीमा, भविष्य निधि या चिकित्सा सुरक्षा के अस्थायी कर्मचारियों के भरोसे लंबे समय तक नहीं छोड़ा जाना चाहिए.
अदालत का अंतिम आदेश और समय-सीमा
हाईकोर्ट ने सीधे तौर पर नियमितीकरण से इनकार करने वाले दुमका प्रशासन के आदेश में तकनीकी सुधार की बात कहते हुए राज्य सरकार (प्रतिवादी संख्या 1) को नए सिरे से कड़े निर्देश दिए हैं. याचिकाकर्ताओं को 3 महीने के भीतर अपने काम की निरंतरता और प्राप्त भुगतानों का पूरा डाटा बंदोबस्त पदाधिकारी, दुमका के समक्ष रखना होगा. बंदोबस्त पदाधिकारी इस डाटा का सत्यापन कर 2 महीने के भीतर इसे राज्य सरकार को अग्रसारित करेंगे.
रिपोर्ट मिलने के बाद राज्य सरकार (प्रधान सचिव, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग) अगले 4 महीनों के भीतर इन पदों के सृजन और इन अनुभवी कर्मचारियों को नियमित करने पर सकारात्मक निर्णय लेगी. अदालत ने इस निर्देश के साथ रिट याचिका को निष्पादित कर दिया, जिससे दो दशकों से अल्प मानदेय पर काम कर रहे दर्जनों पीस-रेटेड कर्मचारियों में नियमित होने की उम्मीद जगी है.