न्यूज़11 भारत
रांची/डेस्क: झारखंड उच्च न्यायालय ने पहली पत्नी की गला दबाकर हत्या करने के एक गंभीर मामले में अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायाधीश संजय प्रसाद की खंडपीठ ने मुख्य अभियुक्त कैलाश राम की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है, जबकि उसकी दूसरी पत्नी ललिता देवी को साक्ष्यों के अभाव में सभी आरोपों से बरी कर दिया है.
क्या है पूरा मामला?
यह मामला हजारीबाग जिले के चारी थाना क्षेत्र के श्यामपट्टी गांव का है. मृतका सीता देवी की शादी वर्ष 1998 में कैलाश राम के साथ हुई थी. शादी के कई साल बीत जाने के बाद भी कोई संतान न होने के कारण कैलाश राम अक्सर अपनी पहली पत्नी सीता देवी के साथ मारपीट और प्रताड़ना करता था. इसी बीच घटना से कुछ दिन पहले ही कैलाश राम ने ललिता देवी से दूसरी शादी कर ली थी.
21 जुलाई 2017 को मायके वालों को सूचना मिली कि सीता देवी की तबीयत खराब है. जब वे चारी स्थित उसके ससुराल पहुंचे, तो सीता देवी का शव चौकी पर पड़ा हुआ था और उसकी गर्दन पर गला दबाने के निशान थे. घटना के बाद से ही पति कैलाश राम और उसकी दूसरी पत्नी ललिता देवी घर से फरार थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डॉक्टरों ने मौत का कारण गला घोंटना बताया था.
निचली अदालत ने दोनों को दी थी उम्रकैद
हजारीबाग की निचली अदालत ने 20 नवंबर 2018 को सुनवाई पूरी करते हुए पति कैलाश राम और दूसरी पत्नी ललिता देवी दोनों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास (उम्रकैद) और 30-30 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी. इस फैसले के खिलाफ दोनों आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी.
हाईकोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 30 सितंबर 2026 को अपना फैसला सुनाया. कोर्ट ने माना कि चूंकि हत्या चारदीवारी के भीतर हुई थी और आरोपी घटना के बाद फरार हो गया था, इसलिए 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106' के तहत यह पति की जिम्मेदारी थी कि वह स्थिति स्पष्ट करे. संतान न होने के कारण प्रताड़ना और दूसरी शादी करना हत्या का स्पष्ट मकसद दर्शाता है. इसलिए कैलाश राम के खिलाफ सजा में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है.
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ललिता देवी की शादी घटना से महज कुछ ही दिन पहले हुई थी. गवाहों के बयानों में उसके खिलाफ प्रताड़ना या हत्या में सीधे शामिल होने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला. केवल इस आधार पर कि वह घटना के बाद डर के मारे घर से भाग गई थी, उसे हत्या का दोषी नहीं माना जा सकता, क्योंकि केवल संदेह किसी कानूनी सबूत का स्थान नहीं ले सकता. अदालत ने ललिता देवी की दोषसिद्धि के आदेश को रद्द करते हुए उन्हें तुरंत बेल बांड की देनदारियों से मुक्त करने का आदेश दिया है.