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पति ने मांगा तलाक, हाईकोर्ट ने कहा- सामान्य वैवाहिक मतभेद क्रूरता नहीं, याचिका खारिज

झारखंड हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य मतभेद, छोटी-छोटी परेशानियां या आपसी असहमति को हर मामले में ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता.

By : Ark Sahuliyar
पति ने मांगा तलाक, हाईकोर्ट ने कहा- सामान्य वैवाहिक मतभेद क्रूरता नहीं, याचिका खारिज

न्यूज़11 भारत 
रांची/डेस्क:
झारखंड हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य मतभेद, छोटी-छोटी परेशानियां या आपसी असहमति को हर मामले में ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता. क्रूरता इतनी गंभीर होनी चाहिए कि पति या पत्नी के लिए दूसरे के साथ रहना मुश्किल हो जाए. कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पति अपनी पत्नी की ओर से की गई कथित क्रूरता को ठोस सबूतों से साबित नहीं कर सका.

न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने पति की ओर से दायर अपील खारिज कर दी. इसके साथ ही रांची फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पति की तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी. 

पति ने पत्नी पर लगाए थे कई आरोप
मामले के अनुसार दोनों का विवाह 28 जुलाई 2011 को रांची के मैरिज ऑफिसर के समक्ष हुआ था. बाद में हिंदू रीति-रिवाज से भी विवाह किया गया. पति ने आरोप लगाया था कि शादी के कुछ समय बाद पत्नी का व्यवहार उसके और उसके माता-पिता के प्रति ठीक नहीं रहा. उसने दुर्व्यवहार और मानसिक परेशानी का भी आरोप लगाया.

पति के अनुसार, वह अपनी पढ़ाई के लिए विदेश गया था और इस दौरान भी वैवाहिक विवाद जारी रहा. उसका कहना था कि पत्नी ने उसके साथ रहना और वैवाहिक संबंध बनाए रखना बंद कर दिया. इन परिस्थितियों को आधार बनाकर उसने क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग की थी.

पत्नी ने आरोपों से किया इनकार
पत्नी ने पति के आरोपों को गलत बताया. उसने दावा किया कि शादी के बाद उसे प्रताड़ित किया गया और दहेज की मांग की गई. पत्नी ने यह भी बताया कि उसने पति की पढ़ाई के लिए आर्थिक मदद की थी और बाद में पति व उसके परिवार के खिलाफ पुलिस में मामला भी दर्ज कराया था. पत्नी का कहना था कि वह तलाक नहीं चाहती और आज भी वैवाहिक संबंध बनाए रखने के लिए तैयार है.

फैमिली कोर्ट में पति आरोप साबित नहीं कर सका
रांची फैमिली कोर्ट ने पति की ओर से लगाए गए क्रूरता के आरोपों की सुनवाई के बाद तलाक की याचिका खारिज कर दी थी. कोर्ट ने पाया था कि पति ने ऐसे ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश नहीं किए, जिनसे यह साबित हो सके कि पत्नी का व्यवहार इतना गंभीर था कि उसके साथ रहना संभव नहीं था. इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी.

हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक क्रूरता की कोई एक तय परिभाषा नहीं है. हर मामले को उसके अपने तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर देखना होता है. हालांकि, क्रूरता इतनी गंभीर और महत्वपूर्ण होनी चाहिए कि पति या पत्नी के लिए दूसरे के साथ रहना उचित रूप से संभव न रह जाए. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक जीवन की सामान्य खटपट, छोटी-छोटी शिकायतें, आपसी स्वभाव का मेल न खाना या सामान्य मतभेद अपने आप में तलाक का आधार नहीं बन सकते.

पत्नी के खिलाफ केस दर्ज कराने को भी कोर्ट ने माना महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी द्वारा पति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना मात्र इस आधार पर क्रूरता नहीं माना जा सकता. जब तक यह साबित न हो कि कानूनी कार्रवाई दुर्भावना से और बिना किसी वास्तविक आधार के की गई थी, उसे क्रूरता नहीं कहा जा सकता.

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद गवाही और दस्तावेजों की समीक्षा के बाद माना कि पति कथित क्रूरता को साबित करने में सफल नहीं हुआ. कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के निष्कर्ष को सही माना और कहा कि उसके फैसले में ऐसी कोई गंभीर गलती नहीं है, जिसके आधार पर उसमें हस्तक्षेप किया जाए. इस आधार पर हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज कर दी. यानी रांची फैमिली कोर्ट का तलाक की याचिका खारिज करने का फैसला बरकरार रहा.
 

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