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रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने करीब 26 साल पुराने यौन उत्पीड़न के मामले में आरोपी सीमांत चार को बड़ी राहत दी है. अदालत ने दुष्कर्म के प्रयास यानी धारा 376/511 IPC के तहत मिली चार साल की सजा को रद्द कर दिया है. हालांकि, अदालत ने मामले के तथ्यों के आधार पर आरोपी को IPC की धारा 354 के तहत दोषी माना और अब तक जेल में बिताई गई 1 माह 9 दिन की अवधि को ही सजा माना है.
15-16 साल की किशोरी से छेड़छाड़ और जबरन सिंदूर लगाने का आरोप
मामला नाला थाना कांड संख्या 100/2000 से जुड़ा है. अभियोजन के अनुसार 7 अक्टूबर 2000 को आरोपी ने करीब 15-16 वर्ष की किशोरी के सिर पर उसकी इच्छा के खिलाफ जबरन सिंदूर लगाया था. इस घटना को लेकर पुलिस में अलग मामला भी दर्ज हुआ था.
इसके बाद 22 अक्टूबर 2000 की सुबह/शाम की घटना को लेकर आरोप लगाया गया कि किशोरी जब गांव के तालाब की ओर गई थी, तभी आरोपी ने उसे पीछे से पकड़ लिया और झाड़ियों की तरफ ले गया. आरोप था कि आरोपी ने चाकू दिखाकर जान से मारने की धमकी दी और उसके साथ दुष्कर्म करने का प्रयास किया. किशोरी के शोर मचाने पर उसके पिता, भाई और बहनोई मौके पर पहुंचे, जिसके बाद आरोपी भाग गया. जाते समय उसके गले की सोने की चेन छीनने का भी आरोप लगाया गया था.
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी चार साल की सजा
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन की ओर से चार गवाह पेश किए गए, जिनमें पीड़िता भी शामिल थी. ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर 9 दिसंबर 2005 को आरोपी को IPC की धारा 376/511 के तहत दोषी ठहराते हुए चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी. इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की.
हाईकोर्ट ने कहा- दुष्कर्म के प्रयास के पर्याप्त तथ्य नहीं
हाईकोर्ट ने गवाहों के बयान और पूरे रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद पाया कि मामले में दुष्कर्म करने की कोशिश से जुड़ा कोई स्पष्ट और विशिष्ट कृत्य पर्याप्त रूप से साबित नहीं हुआ है. अदालत ने माना कि पीड़िता की गवाही को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, हालांकि उसकी गवाही में कुछ विरोधाभास और बाद में किए गए सुधार सामने आए. अदालत के अनुसार उपलब्ध साक्ष्यों से IPC की धारा 376/511 के बजाय धारा 354 के तहत महिला की गरिमा भंग करने वाला हमला साबित होता है. इसलिए धारा 376/511 के तहत दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर आरोपी को धारा 354 में दोषी ठहराया गया.
26 साल बीतने और पहले से जेल में रहने को देखते हुए राहत
सजा पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि घटना को करीब ढाई दशक से अधिक समय बीत चुका है. आरोपी करीब 1 माह 9 दिन जेल में रह चुका है. अदालत ने मामले की परिस्थितियों, आरोपी की उम्र, चरित्र और पूर्व रिकॉर्ड को देखते हुए उसकी सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया. न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने 31 अगस्त 2026 को फैसला सुनाते हुए अपील को मेरिट पर खारिज किया, लेकिन दोषसिद्धि और सजा में संशोधन कर दिया. चूंकि आरोपी पहले से जमानत पर था, अदालत ने उसका बेल बॉन्ड और जमानतदारों को भी मुक्त कर दिया.
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