विरेन्द्र शर्मा/ न्यूज़ 11 भारत
बरही/डेस्क: हजारीबाग जिले के चौपारण प्रखंड में जीटी रोड स्थित दनुआ घाटी मौत का घाटी के नाम से जाना जाने लगा, लेकिन यहां स्थित हथिया बाबा मंदिर क्षेत्र का एक अनोखा और श्रद्धा का महत्वपूर्ण केंद्र है. यह मंदिर महुआटांड़/महानेटांड़ क्षेत्र के समीप जीटी रोड के किनारे स्थित है और वर्षों से इस मार्ग से गुजरने वाले यात्रियों, वाहन चालकों तथा आसपास के ग्रामीणों की आस्था से जुड़ा हुआ है.
मंदिर की स्थापना से जुड़ी सबसे चर्चित कथा वर्ष 1953 की बताई जाती है. स्थानीय मान्यता के अनुसार उस समय जीटी रोड पर एक हाथी को तेज रफ्तार ट्रक ने टक्कर मार दी थी, जिससे उसकी मृत्यु हो गई. इसके बाद उसी स्थान के आसपास लगातार सड़क दुर्घटनाएं होने लगीं. इससे स्थानीय लोगों में चिंता और भय का वातावरण बनने लगा.
हथिया बाबा मंदिर के पुजारी जेठू भगत ने बताया कि स्थानीय बुद्धजीवी और गणमान्य लोगों ने महडंडे के स्थानीय रूप से प्रसिद्ध महरू भगत से इस संबंध में सलाह ली. उन्होंने हाथी की स्मृति में उसी स्थान के पास मंदिर बनाने और हाथी की प्रतिमा स्थापित करने की बात कही. इसके बाद वहां मंदिर बनाया गया और हाथी की प्रतिमा स्थापित की गई.
दलित पुजारी की प्रतिमा बनी मंदिर की पहचान
हथिया बाबा मंदिर की सबसे विशेष बात यह है कि यहां हाथी की प्रतिमा के साथ एक दलित पुजारी महरू भगत की प्रतिमा भी श्रद्धा से जुड़ी हुई है. पुजारी जेठू भगत के अनुसार महरू भगत ही मंदिर के शुरुआती पुजारी बने थे जो मेरे पिताजी थे. जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर उनकी प्रतिमा के प्रति श्रद्धा इस मंदिर को सामाजिक समरसता का अनोखा उदाहरण बनाती है.
यात्रियों की आस्था का केंद्र
जीटी रोड से झारखंड और बिहार के बीच लगातार आवागमन होने के कारण मंदिर यात्रियों के लिए भी विशेष महत्व रखता है. स्थानीय लोगों के अनुसार ट्रक चालक, परिवार के साथ यात्रा करने वाले लोग और अन्य राहगीर यहां रुककर दर्शन करते हैं और सुरक्षित यात्रा की कामना करते हैं. आज भी मंदिर के आसपास से गुजरने वाले कई वाहन चालक श्रद्धापूर्वक सिर झुकाकर आगे बढ़ते हैं. यही कारण है कि हथिया बाबा मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि दनुआ घाटी और जीटी रोड की स्थानीय पहचान का भी हिस्सा बन चुका है.
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