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रांची/डेस्क: करीब साढ़े बारह साल से कोमा में पड़े गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा की जिंदगी पर अब सुप्रीम कोर्ट बड़ा फैसला लेने जा रहा हैं. हरीश को पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) देने की मांग पर गुरुवार, 15 जनवरी को शीर्ष अदालत में अहम सुनवाई होगी. यह मामला न सिर्फ एक परिवार के दर्द की कहानी है, बल्कि गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार से जुड़ा एक संवेदनशील सवाल भी खड़ा करता हैं.
परिजनों से सीधे मिले जज
इससे पहले मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट की पीठ में शामिल जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने हरीश के माता-पिता से कोर्ट के कमेटी रूम में मुलाकात की. पिछली सुनवाई में ही अदालत ने कहा था कि अंतिम निर्णय लेने से पहले वह परिजनों से मिलकर जमीनी सच्चाई जानना चाहती हैं. कोर्ट ने विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा गठित दो मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को भी रिकॉर्ड पर लिया हैं.
सूत्रों के अनुसार, मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में हरीश के ठीक होने की संभावना बेहद कम बताई गई हैं. रिपोर्ट्स में साफ कहा गया है कि मस्तिष्क को स्थायी नुकसान पहुंच चुका है और हालत में सुधार की कोई ठोस उम्मीद नहीं दिखती.
बिस्तर पर ही बीत रही जिंदगी
राणा परिवार के वकील मनीष जैन के मुताबिक, हरीश पिछले साढ़े 12 साल से बिस्तर पर ही सांसें ले रहा हैं. उसे ट्यूब के जरिए तरल भोजन दिया जा रहा हैं. वह न बोल सकता है, न किसी तरह अपनी स्थिति जाहिर कर सकता हैं. कभी-कभार आंखें खुलती भी है तो उनमें कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखती. लंबे समय से एक ही स्थिति में पड़े रहने की वजह से उसकी पीठ में गहरे घाव भी बन गए हैं.
2013 की घटना ने बदली जिंदगी
हरीश राणा चंडीगढ़ में बीटेक की पढ़ाई कर रहा था. 20 अगस्त 2013 को वह चौथी मंजिल से गिर गया या गिरा दिया गया. इस हादसे में उसके सिर में गंभीर चोट लगी और मस्तिष्क को स्थायी नुकसान पहुंचा. तभी से वह कोमा में है और अब तक होश में नहीं आया.
माता-पिता की गुहार
तीन साल पहले हरीश के माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उनकी दलील है कि जब उनके बेटे को गरिमापूर्ण जीवन नहीं मिल सका, तो कम से कम उसे गरिमापूर्ण मौत का अधिकार तो मिलना चाहिए. परिजनों का कहना है कि वर्षों से चल रहा इलाज न सिर्फ शारीरिक पीड़ा बढ़ा रहा है, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी परिवार को तोड़ चुका हैं.
इच्छामृत्यु क्या है और क्या कहता है कानून?
इच्छामृत्यु का मतलब है किसी गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को उसकी इच्छा या परिजनों की सहमति से मृत्यु की अनुमति देना, ताकि उसे असहनीय पीड़ा से मुक्ति मिल सके. इच्छामृत्यु दो तरह की होती है एक्टिव यूथेनेशिया, इसमें डॉक्टर दवा या इंजेक्शन देकर मरीज की जान लेते है, जो भारत में गैरकानूनी है और पैसिव यूथेनेशिया, इसमें जीवन रक्षक इलाज बंद कर दिया जाता है, जैसे वेंटिलेटर हटाना या दवाएं रोकना. सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2018 में सख्त दिशा-निर्देशों के साथ पैसिव यूथेनेशिया को मंजूरी दी थी. अब पूरे देश की नजर सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई पर टिकी हैं.
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