अदालत का फैसला

मद्रास हाई कोर्ट का फैसला बनेगा देश भर के लिए नजीर!: इस्लाम अपनाया तो पिछड़ी जाति का दर्जा खत्म

तमिलनाडु सरकार को झटका देते हुए आरक्षण का लाभ देने से किया इनकार

By : Pramod Kumar , News11 Bharat
मद्रास हाई कोर्ट का फैसला बनेगा देश भर के लिए नजीर!: इस्लाम अपनाया तो पिछड़ी जाति का दर्जा खत्म

न्यूज11  भारत

रांची/डेस्क: मद्रास हाईकोर्ट ने धर्म परिवर्तन को लेकर एक ऐसा फैसला सुनाया है जो सिर्फ तमिलनाडु के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक नजीर है. मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को बड़ा झटका देते हुए धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण देने वाले एक सरकारी आदेश को रद्द कर लिया है. तमिलनाडु के सरकारी आदेश के अनुसार, हिंदू धर्म की पिछड़ी, अति-पिछड़ी अथवा अनुसूचित जातियों से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को पिछड़ी जाति की मुस्लिम श्रेणी में रखते हुए इस श्रेणी के आरक्षण का लाभ दिया जा रहा था. लेकिन अदालत ने इस आदेश को असंवैधानिक करार दे दिया है.

मद्रा हाई कोर्ट में जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस पी.बी. बालाजी की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया है. खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति के इस्लाम स्वीकार करने के बाद उसे केवल मुस्लिम माना जाएगा. वह केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर उन मुस्लिम समुदायों का सदस्य होने का दावा नहीं कर सकता, जिनकी पहचान जन्म से निर्धारित होती है.

मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु के एक मामला में सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया है. तमिलनाडु के थूथुकुडी निवासी समीर अहमद जो धर्म परिवर्तन से पहले परमशिवम था. हिंदू परिवार के इस सदस्य ने 2015 में इस्लाम धर्म अपनाकर अपना नाम समीर अहमद रख लिया. मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार उसने निकाह भी किया. इसके बाद उन्होंने 'मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का प्रमाणपत्र जारी करने के लिए आवेदन किया जो राज्य में पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी है. तहसीलदार ने जब उसका आवेदन अस्वीकार कर दिया तब उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. अपनी याचिका में उसने उस सरकारी आदेश का हवाला दिया, जिसमें धर्म परिवर्तन करने वाले कुछ लोगों को आरक्षण के लाभ की व्यवस्था है. लेकिन अदालत ने राज्य सरकार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया औरकहा कि मुस्लिम समाज में राउथर, मरक्कयार, लेब्बाई और दक्कनी जैसे कई समुदाय मौजूद हैं, लेकिन इनकी पहचान जन्म के आधार पर होती है न कि धर्म परिवर्तन के आधार पर. इसलिए धर्म परिवर्तन करने वाले किसी व्यक्ति को इन समुदायों का सदस्य नहीं माना जा सकता.

खंडपीठ ने अपने निर्णय में 1951 के जी. माइकल बनाम एस. वेंकटेश्वरन मामले का भी उल्लेख किया. उस केस में भी अदालत ने कहा था कि कोई हिंदू इस्लाम स्वीकार करता है, तो वह केवल मुस्लिम बनता है. उसकी सामाजिक या सामुदायिक पहचान उसकी पूर्व जाति के आधार पर : निर्धारित नहीं हो सकती.

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