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रांची/डेस्क: क्या आप कल्पना कर सकते है कि अगर सरकार आपके स्मार्टफोन इस्तेमाल करने के समय को नियंत्रित करना शुरू कर दे तो क्या होगा? यह सवाल आज दुनिया के कई हिस्सों में चर्चा का विषय बन गया है, जहां डिजिटल दुनिया और वास्तविक जीवन के बीच की सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं. यह सिर्फ एक व्यक्ति के अधिकार का मामला नहीं है, बल्कि एक पूरे समाज के स्वास्थ्य और भलाई से जुड़ा हैं.
जापान के एक शहर में सरकार ने डिजिटल उपकरणों के अत्यधिक इस्तेमाल पर लगाम लगाने के लिए एक अनोखा प्रस्ताव पेश किया हैं.आइची प्रांत के टोयोआके शहर में एक नया कानून लाने की तैयारी है, जिसके तहत लोगों के लिए स्क्रीन टाइम को सीमित किया जाएगा. इस प्रस्ताव का उद्देश्य स्मार्टफोन और अन्य डिजिटल डिवाइस के ज्यादा इस्तेमाल से होने वाले मानसिक और शारीरिक नुकसान को कम करना हैं. इस प्रस्तावित कानून के मुताबिक, लोगों को दिन में सिर्फ दो घंटे ही फोन का इस्तेमाल करना चाहिए. इसके अलावा प्राथमिक स्कूल के बच्चों को रात 9 बजे के बाद और बड़े छात्रों और वयस्कों को रात 10 बजे के बाद डिवाइस का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. इस नियम का मकसद लोगों को परिवार के साथ बातचीत करने और बेहतर स्वास्थ्य पर ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित करना हैं.
टोयोआके के मेयर मासाफुमी कोकी ने कहा कि इस प्रस्ताव का मकसद लोगों के अधिकारों को छीनना नहीं है, बल्कि उन्हें स्वास्थ्य शिक्षा और पारिवारिक जीवन पर अत्यधिक स्क्रीन टाइम के नकारात्मक प्रभावों के बारे में जागरूक करना हैं. उन्होंने उम्मीद जताई कि यह हर परिवार को अपने फोन के इस्तेमाल पर सोचने और चर्चा करने का मौका देगा.
हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर लोगों के बीच बहस छिड़ गई हैं. 21 से 25 अगस्त के बीच, शहर के अधिकारियों को 120 से ज़्यादा कॉल और ईमेल मिले, जिनमें से करीब 80% लोगों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया. कई लोगों ने सवाल उठाया कि क्या सरकार को इस तरह के व्यक्तिगत फैसलों में दखल देने का अधिकार हैं. वहीं, कुछ लोगों ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि इससे स्मार्टफोन की लत कम करने में मदद मिलेगी.
अगर यह विधेयक पारित हो जाता है, तो यह जापान का पहला शहरव्यापी कानून होगा जो न केवल बच्चों, बल्कि सभी निवासियों के लिए स्क्रीन टाइम को सीमित करेगा. दुनिया भर में कई देश डिजिटल लत की समस्या से जूझ रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के लोगों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया है, जबकि दक्षिण कोरिया ने भी स्कूलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल को सीमित कर दिया हैं. टोयोआके का यह कदम दिखाता है कि सरकारें इस समस्या से निपटने के लिए कितनी गंभीर हैं.