न्यूज 11 भारत / पटना डेस्क (राहुल कुमार, शेरघाटी): सुकराडीह गांव के पूर्व मुखिया रामचंद्र सिंह भोक्ता कहते हैं कि बिना दहेज के शादी की परंपरा 200 साल पुरानी है। सदियों पहले जब उनके पूर्वज में किसी की शादी हो रही थी, तब दहेज की रकम में एक आने के लिए झगड़ा हुआ था। तब बाबा 'पूर्वज' ने नियम बनाया था कि उनके गांव में कोई भी दहेज नहीं देगा और ना ही बेटों की शादी में लेगा.
दो बहनों की एक साथ होगी शादी
वहीं सुकराडीह गांव में 60 वर्षीय शकुंतला देवी भी रहती हैं। उनकी दो बेटियां सोनी और प्रियंका हैं। दोनों मैट्रिक पास हैं और अगले महीने दोनों की शादी झारखंड में होने वाली है। शकुंतला देवी बेटियों की शादी को लेकर खुश भी हैं और वो तैयारी में भी लगी हैं। साथ ही पूर्वजों द्वारा बनाए गए दहेज मुक्त प्रथा की जमकर तारीफ करती हैं। "अगर किसी ने दहेज लिया तो पंचायत बैठती है और फिर उसकी सजा का निर्णय होता है। सजा एक ही तरह की होती है कि ताड़ की लकड़ी को पहले आग पर गरम किया जाता है और फिर उससे पंचायत में तय की गई संख्या के अनुसार दोषी को मारा जाता है। फिर समाज से उसका बहिष्कार किया जाता है, हालांकि समाज में वापसी के लिए भी उस व्यक्ति और घर के लोगों को एक मौका भी दिया जाता है।"- रामचंद्र सिंह भोक्ता, पूर्व मुखिया
बिहार के तीन गांव दहेज मुक्त
आमस प्रखंड के सुकराडीह, बाघमारा और बागबेड़ा गांवों में न तो कोई दहेज लेता है और न ही कोई देता है। सरकारी पदों पर काम करने वाले युवक भी इस प्रथा के खिलाफ हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब हमारे पूर्वजों ने दहेज के खिलाफ नियम बनाए थे तो हम उसे क्यों तोड़ेंगे और जो तोड़ता है उसे पंच मिलकर सजा देती है।
1955 से दर्ज नहीं हुआ दहेज से जुड़ा केस
1955 से यानी कि करीब 71 सालों से इन गांवों से कभी दहेज उत्पीड़न के केस सामने नहीं आए। गया जिला मुख्यालय से लगभग 75 किलोमीटर दूरी पर स्थित आमस प्रखंड के सुकराडीह, बाघमारा और बागबेड़ा गांव में दहेज को आजादी के पहले से ही अपराध माना जाता है। ये तीनों गांव दहेज जैसी कुप्रथा से पूरी तरह मुक्त हैं।
बिहार से कब खत्म होगी कुप्रथा
साल 2019 से साल 2023 तक सिर्फ बिहार में दहेज के 16,496 मामले दर्ज हुए हैं। 2019 से 2023 में 5,274 महिलाएं दहेज के लिए अपनी जान गंवा चुकी हैं। बिहार में हर साल औसतन 1,000 से ज्यादा महिलाओं की दहेज के लिए हत्या कर दी जाती है। दहेज के मामले और दहेज हत्याओं में बिहार लगातार टॉप-2 में है। भले ही गया के तीन गांवों से दहेज के दानव का अंत हो गया हो, लेकिन प्रदेश में लड़कियों को आज भी इसका दंश झेलना पड़ता है।
70 घरों का गांव है सुकराडीह
आमस प्रखंड का सुकराडीह गांव भले ही पहाड़ की तलहटी में बसा हो, मगर दहेज जैसी कुप्रथा को लेकर इसका संदेश शहर और गांव-गांव की गलियों तक फैला हुआ है। सुकराडीह गांव में 70 घर हैं और यहां लगभग 1000 की आबादी है।
भोक्ता समाज निभा रही परंपरा
इसी तरह बाघमरवा और बागबेड़ा गांवों में भी 1000-1000 से अधिक लोगों की आबादी बताई जाती है। तीनों गांव में भोक्ता समाज के लोग सदियों से रह रहे हैं। 1914 के सर्वे में सुकराडीह गांव का नाम दर्ज है। यहां के लोगों की सबसे बड़ी विशेषता और ताकत यह है कि ये बिना दहेज की शादी करते हैं। इसमें अमीर गरीब शिक्षित अशिक्षित सभी शामिल हैं.
संपन्न परिवार के बेटे करते हैं गरीब लड़कियों से शादी
न्यूज 11 भारत की टीम जब सुकराडीह गांव पहुंची तो शकुंतला देवी कुछ महिलाओं के साथ एक घर के बाहर बैठी हुई मिली। दहेज मुक्त गांव होने पर वो कहती हैं कि उनकी ये परंपरा पुरखों से चली आ रही है। उनके 'भोक्ता समाज' के खुशहाल सुखी संपन्न परिवार के बेटों की शादी गरीब घर की बेटियों से बिना दहेज के होती है। "हम बेटियों को बोझ नहीं मानते और ना ही उनके पैदा होते ही दहेज के लिए पैसे जोड़ना शुरू करते हैं। हम अपनी सहुलियत के अनुसार ही बेटी दामाद को तोहफे देते हैं। क्योंकि हमारे यहां कोई जोर जबरदस्ती नहीं है। हमारे समाज में किसी परिवार की बेटी बिन ब्याही नहीं रहती है।"- शकुंतला देवी, ग्रामीण,सुकराडीह गांव
दामाद नहीं खरीदेंगे
शकुंतला देवी कहती हैं कि बेटियां मेरा अभिमान हैं। हम दहेज देकर दामाद नहीं खरीदेंगे। वह खुश है कि उनके गांव में दहेज जैसी कुप्रथा नहीं है। उनकी भी जब शादी हुई थी तब उनके माता-पिता ने उनके पति को दहेज नहीं दिया था।
भोक्ता समाज की सदियों पुरानी परंपरा
भोक्ता समाज के कई गांव जिले में हैं। लगभग सभी जगह इस समाज में सदियों से दहेज लेना वर्जित है। भोक्ता समाज की एक खासियत यह भी है कि साल में एक बार समाज के बुद्धिजीवियों का सम्मेलन होता है। यह सम्मेलन टेंट लगाकर या होटल में नहीं होते बल्कि गांव में पीपल के पेड़ के नीचे होते हैं, जिसमें समाज की बुराइयों को खत्म करने और विकसित समाज बनाने खास कर शिक्षा पर मंथन होता है।
200 साल पुरानी परंपरा
गांव के बूढ़े बुजुर्ग कहते हैं कि यहां विवाह को केवल दो परिवारों और दो दिलों को जोड़ने वाला पवित्र बंधन की तरह ही ट्रीट किया जाता है। इसलिए यहां कोई दहेज मांगता भी नहीं है और ना ही दिया जाता है। इस अच्छी पहल की शुरुआत सुकराडीह गांव ने 200 सालों पहले की थी.
पहले खूब मिल चुकी है सजा
गांव के ही एक और व्यक्ति राज देव सिंह भोक्ता कहते हैं कि उनके गांव में जब शुरुआती दौर में दहेज मुक्त होने की घोषणा की गई थी। तब काफी उल्लंघन भी हुए थे। फिर गांव के बड़े बुजुर्गों और समाज के लोगों ने नियम बनाए। उन नियमों का पालन करने के लिए कई लोगों को सजा भी दी गई। अब तो गरीब हो या अमीर सब मिलकर इस निर्णय का पालन करते हैं।
शिक्षा से बदली सोच
उन्होंने आगे कहा कि लोगों की सोच बदलने में शिक्षा की बड़ी भूमिका है। पहले जागरूकता की कमी थी। समाज के लोग पढ़े-लिखे नहीं होते थे। अब तो अधिकतर घर से यहां कोई ना कोई कम से कम मैट्रिक तो जरूर पास है। गांव में प्राथमिक विद्यालय भी है, जबकि पास के गांव में मध्य विद्यालय है और हाई स्कूल आमस प्रखंड में स्थित है। "कोई गरीब लड़की है तो समाज के सुखी संपन्न लोग बारात के खान-पान की व्यवस्था का जिम्मा लेते हैं। इतना ही नहीं लड़के वाले भी लड़की के माता-पिता को शादी में आर्थिक रूप से चाहे वह अनाज की शक्ल में हो या अन्य माध्यम हो उसकी मदद करते हैं। हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए एक तरह से वरदान वाला काम किया है।"- राज देव सिंह भोक्ता, ग्रामीण
दहेज के चक्कर में बिक जाते हैं घर-बार
गांव के युवा भी अपनी परंपराओं को खूब निभा रहे हैं। गांव में 6 से अधिक युवा सरकारी सेवा में हैं। इनमें बीपीएससी शिक्षक से लेकर रेलवे, पुलिस विभाग में कार्यरत हैं। एक दूसरे गांव के एक युवा समाजिक कार्यकर्ता उदित कुमार कहते हैं कि हम पढ़े लिखे हैं। आए दिन देखते हैं कि गरीब माता -पिता बेटी की शादी में घर बार भी बेच देते हैं। हमें अपनी सोच बदलनी होगी।"कर्ज के तले लड़की का परिवार दब जाता है। फिर खबर आती है कि दहेज उत्पीड़न की शिकार बेटी हो रही है। कभी कभार तो बेटियों को जान भी गंवाना पड़ती है। ऐसे में अगर हमारे समाज में यह परंपरा है तो हम लोगों के लिए यह बड़ी बात है."- उदित कुमार,समाजिक कार्यकर्ता
BPSC शिक्षक ने नहीं लिया दहेज
गांव के प्राथमिक विद्यालय में विकास कुमार भोक्ता शिक्षक हैं। वो बीपीएससी से शिक्षक बने हैं। इससे पहले रेलवे में कार्यरत थे। उनकी शादी भी पिछले साल हुई है। वह बताते हैं कि उन्होंने बिना दहेज के शादी की है। उनके समाज में शादी बेहद साधारण और सादगी के साथ होती है। अभी भी बारातियों को ठहरने के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं होती है। "गांव के ही खुले मैदान में सिर्फ एक टेंट लगता है। हम लोग इस बात का भी ख्याल रखते हैं कि कम से कम संख्या में सिर्फ परिवार के कुछ ही लोग बाराती के रूप में जाएं, ताकि लड़की वालों को ज्यादा परेशानी नहीं उठानी पड़े।"- विकास कुमार भोक्ता, बीपीएससी शिक्षक
बिना दहेज के दो बेटों की शादी
पूर्व मुखिया राज देव सिंह भोक्ता की पत्नी मुनरवा देवी कहती हैं कि उनके दो बेटे हैं। बड़ा बेटा रंजीत स्वास्थ्य विभाग में सरकारी नौकरी में है। उसकी शादी भी बिना तिलक के की है, जबकि छोटा बेटा विकास कुमार शिक्षक है। उसकी शादी में भी कुछ नहीं लिया। "हमारे घर में सिर्फ बेटे की शादी में ही तिलक नहीं लिया जाता, बल्कि बेटियों की शादी में भी तिलक नहीं दिया जाता है. इस सदियों पुरानी परंपरा पर हमें गर्व है."- मुनरवा देवी, पूर्व मुखिया राज देव सिंह भोक्ता की पत्नी
शगुन लेने पर भी प्रतिबंध
गांव की एक और महिला बसंती देवी बताती हैं कि यहां तिलक क्या शादी के लिए जब रिश्ता तय होता है, तब शगुन भी नहीं दिया जाता है। 1955 में आखिरी बार लड़की पक्ष से शगुन के रूप में 30 रुपए लिए गए थे। अब यह परंपरा भी समाप्त हो चुकी है। "अब शगुन भी नहीं दिया जाता है.लड़के वाले भी शगुन के नाम पर कुछ नहीं लेते हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ यहीं के लड़के से शादी में ऐसा होता है बल्कि कहीं दूसरी जगह भी बेटियों की शादी करते हैं तो वहां भी लड़के पक्ष को ना तो शगुन दिया जाता है और ना ही तिलक दिया जाता है।"- बसंती देवी, ग्रामीण
मेरे रहते दहेज का एक भी नहीं आया केस
इस संबंध में आमस थाना अध्यक्ष धनंजय कुमार ने बताया कि थाना अध्यक्ष धनंजय कुमार छुट्टी पर हैं, इसलिए वो चार्ज में हैं। लेकिन पिछले 2 सालों से वो यहां कार्यरत हैं। उनके समय में सुकराडीह गांव से एक भी केस दहेज उत्पीड़न, दहेज लेनदेन का थाना में नहीं हुआ है। "ऐसे में सुकराडीह गांव को दहेज मुक्त गांव कहा जाए तो सही होगा। हालांकि दहेज उत्पीड़न दहेज लेनदेन या दहेज से संबंधित तो कोई मामले नहीं हैं।लेकिन अन्य घटनाओं के मामले जरूर सामने आते हैं। गांव के लोगों से दहेज नहीं लेने की बात सामने आती है।"- धनंजय कुमार,आमस थाना अध्यक्ष
देशवासियों से अपील
सुकराडीह गांव के लोग कहते हैं कि अगर बाकी समुदाय और समाज के लोग भी भोक्ता समाज की तरह ही विवाह को सरल पवित्र और लेनदेन से मुक्त बनाएं तो दहेज प्रथा खत्म ही नहीं होगी बल्कि बेटियां ससुराल में दहेज के लिए प्रताड़ित भी नहीं होगी। इस तरह की सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के लिए सरकारी तंत्र की जरूरत नहीं है, बल्कि खुद को बदलें और समाज में ऐसे बदलाव लाने के लिए पहल करें।