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रांची/डेस्क: बिहार में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार बन भी जाये, उन्होंने जो बहुत सारे 'असम्भव' से वायदे कर डाले हैं, उनमें से कुछ पूरा कर भी लें तो भी उनके लिए भूमिहीन परिवारों को 5 डिसमिल भूमि मुहैया कराना उनके लिए आसमान से चांद तोड़कर लाने के बराबर है, यह सच वह भी जानते हैं, उनके विरोधी यानी एनडीए वाले भी जानते हैं और जो बिहार की यथास्थिति को जानते हैं उन विशेषज्ञों-विश्लेषकों को भी पता है. इसके कई कारण गिनाये जा सकते हैं. लेकिन उनको गिनाने से पहले इस हकीकत पर भी नजर दौड़ाना पड़ेगा जो बिहार की सही और असली तस्वीर प्रस्तुत करती है.
बिहार की जनसंख्या की ताजा स्थिति का तो फिलहाल किसी को पता नहीं, है, अगर 2011 में हुई जनसंख्या को ही आधार बना लें तो बिहार में उस समय 9 करोड़ से ज्यादा की आबादी थी. इस आबादी की एक दिल हिला देने वाली सच्चाई यह है कि इसकी 60% आबादी भूमिहीन है. अगर आंकड़ों में इसे प्रस्तुत करें तो यह 5.4 करोड़ के असपास तो होगी ही. इस आबादी को अगर परिवार के रूप में देखें तो 4, 5 या 6 जन का एक परिवार मान लिया जाये तो बिहार में भूमिहीन परिवारों की संख्या भी 1 करोड़ तक पहुंच जायेगी. 1 करोड़ परिवारों की संख्या को ही पैमाना मान लें तो इतनी बड़ी आबादी के लिए इतनी भूमि या इतनी भूमि देने के लिए, सरकारी दर पर ही सही, पैसा कहां से आयेगा. जबकि महागठबंधन ने तो बड़े-बड़े वादे कर दिये हैं, उन्हीं पर इतना खर्च हो जायेगा कि किसी को एक छटांक भूमि देना भी मुश्किल हो जायेगा.
ऐसा नहीं है कि बिहार में भूमिहीन परिवारों को भूमि देने का प्रयास किया ही नहीं गया है, लेकिन इस रास्ते में इतनी परेशानियां है कि उस पर कोई भी सरकार आगे बढ़ना तो दूर खिसक भी नहीं पायी है. आप उन कारणों को भी समझ लें, पहली तो बिहार भूमि की उपलब्धता ही बड़ी बाधा है, फिर बिहार में दबंगों ने भूमि पर जो अवैध कब्जे कर रखे हैं इसका समाधान तो सरकारों के वश की भी बात नहीं है. फिर भूमि देने से ही काम चलने वाला नहीं है. सरकार भूमि देगी तो भूमिहीनों को घर बनाने के लिए सहायता भी तो प्रदान करेगी. फिर भूमिहीनों के बीच भूमि का वितरण भी बड़ी चुनौती है. एक जानकारी यह भी है कि कई वर्षों से कई क्षेत्रों में भूमि का वैज्ञानिक सर्वेक्षण नहीं हुआ है. इसके कारण सरकार के पास ही भूमि के रिकॉर्ड और स्वामित्व की स्पष्ट जानकारी नहीं है।
महागठबंधन की क्या यह सिर्फ चुनावी घोषणा है या फिर कोई प्लान भी बनाया है?
प्रथम दृष्टया तो यह महागठबंधन की एक चुनावी घोषणा ही लगता है, क्योंकि महागठबंधन किसी भी सूरत में एनडीए को सत्ता से बाहर करना चाहता है. लेकिन अगर महागठबंधन ने कोई योजना बनाकर यह घोषणा की है तब भी इसके पूरा हो पाने में संशय की गुंजाइश तो बनती है. इसका कारण, जैसा कि पहले भी बताया कि भूमि की अनुपलब्धता एक बड़ा कारण बनेगा, योजना के फ्लॉप होने में. पहले यह जान लें कि बिहार को कुछ क्षेत्रफल कितना है. बिहार का कुल क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किलो मीटर है. क्षेत्रफल तो काफी बड़ा है. मगर इस क्षेत्रफल का 76% हिस्सा खेती योग्य है. कृषि योग्य सकल क्षेत्रफल 79,460 वर्ग किमी के आसपास है. अगर महागठबंधन खेती योग्य भूमि से छोटा हिस्सा भी देता है तो यह सबसे बड़ा अपराध होगा.
बिहार में कुल 72,349 वर्ग किमी में खेती होती है। यह राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र (94,163 वर्ग किमी) का लगभग 76% हिस्सा है। इसमें शुद्ध खेती योग्य भूमि 56.03 लाख हेक्टेयर (लगभग 56,030 वर्ग किमी) और सकल खेती योग्य भूमि 79.46 लाख हेक्टेयर (लगभग 79,460 वर्ग किमी) है। इसके बाद बिहार में वनभूमि क्षेत्र 7,532.45 वर्ग किमी है जो कि कुल क्षेत्रफल के 7 प्रतिशत से ज्यादा है. कुछ और अनुपलब्ध भूमि को भी जोड़ लिया जाये तो यह करीब 85% तक जा पहुंचेगा. यानी बची हुई करीब 15%जमीन पर ही महागठबंधन 'खेला' कर सकता है. मगर यह कोई आवश्यक नहीं कि बची हुई 15 प्रतिशत जमीन सामान्य रहवास के लिए उचित हो. फिर सभी को पता है कि बरसात के दिनों में बिहार की हालत क्या हो जाती है, अगर इस क्षेत्र में भूमिहीनों को जमीन दे दी गयी तो फिर यह उनकी 'हत्या' करने के समान नहीं होगा.
वन भूमि पट्टा वितरण बिहार में अब तक अधूरा
बिहार में वनक्षेत्र में रहने वाले भूमिहीनों को भूमि देने का प्रयास किया गया है. अब तक सिर्फ 20,000 लोगों को ही वनभूमि पट्टा दिया जा सकता है. 18,000 से ज़्यादा वन भूमि पट्टों के आवेदन निरस्त किए गए हैं, और लगभग 14,000 आवेदन लंबित हैं। 2016 के आंकड़ों के अनुसार, जिन 20,000 लोगों को वन भूमि पट्टे मिले हैं, वह लगभग 45,000 एकड़ क्षेत्र में हैं.
बिहार में महागठबंधन ने अन्य घोषणाओं के साथ भूमिहीनों को भूमि देने की जो घोषणा की है, मकसद उनकी आलोचना करना नहीं है, मकसद एक सच्चाई को प्रस्तुत करना है कि जो घोषणा की गयी है, वह एक अविश्वसनीय घोषणा है. जिसे अगर किसी तरह से पूरा कर भी दिया जाये तो यह आने वाले दिनों में ऐसी पारिवारिक और सामाजिक समस्याओं को जन्म देगा जिसे सदियों तक नहीं सुलझाया जा सकता है.
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