न्यूज 11 भारत / बिहार डेस्क: बिहार में जमीन की खरीद-बिक्री में होने वाले फर्जीवाड़े और सालों-साल चलने वाले अदालती विवादों पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकार ने एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। अब प्रदेश में किसी भी जमीन की रजिस्ट्री तब तक मुमकिन नहीं होगी, जब तक संबंधित अंचलाधिकारी (CO) अपनी जांच रिपोर्ट नहीं सौंप देते। इस नई व्यवस्था का सीधा मकसद भू-माफियाओं के सिंडिकेट को तोड़ना और आम जनता की गाढ़ी कमाई को सुरक्षित करना है।
ई-निबंधन पोर्टल पर आवेदन अनिवार्य, डिजिटल होगी पूरी जांच
नई व्यवस्था के तहत अब जमीन बेचने और खरीदने वाले पक्षों को सबसे पहले सरकार के 'ई-निबंधन' पोर्टल पर ऑनलाइन दस्तक देनी होगी।
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पोर्टल पर आवेदन करते समय जमीन से जुड़े सभी मूल दस्तावेज अपलोड करना अनिवार्य होगा।
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आवेदन जमा होते ही वह डेटा सीधे अंचल कार्यालय पहुंचेगा, जहाँ सीओ और उनकी टीम जमीन की चौहद्दी, खाता-खेसरा और मालिकाना हक की गहन पड़ताल करेगी।
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अंचल कार्यालय से 'नो ऑब्जेक्शन' या जांच रिपोर्ट मिलने के बाद ही निबंधन कार्यालय रजिस्ट्री की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगा।
10 दिनों की समय सीमा: अधिकारियों की तय होगी जवाबदेही
अक्सर सरकारी कामों में होने वाली देरी को देखते हुए सरकार ने इस बार सख्त रुख अपनाया है। सभी अंचलाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि उन्हें किसी भी हाल में 10 कार्यदिवसों के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट पोर्टल पर अपलोड करनी होगी। यदि तय समय के भीतर रिपोर्ट नहीं आती है, तो पोर्टल पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर रजिस्ट्री की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी, लेकिन देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
इन जानकारियों का मिलान होगा सबसे जरूरी
जमीन की वास्तविकता जांचने के लिए आवेदन फॉर्म में कुछ जानकारियां अनिवार्य की गई हैं, जिनके बिना रिपोर्ट अधूरी मानी जाएगी:
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क्या विक्रेता के नाम पर वास्तव में उतनी जमीन की जमाबंदी कायम है?
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सीओ को अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट करना होगा कि संबंधित जमीन निजी है या वह सरकारी (गैर-मजरूआ) जमीन तो नहीं है।
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जमीन की चौहद्दी का भौतिक सत्यापन होगा ताकि भविष्य में पड़ोसियों के साथ कोई विवाद न खड़ा हो।
पारदर्शिता से रुकेगी धोखाधड़ी, खरीदारों का बढ़ेगा भरोसा
प्रशासन का मानना है कि इस 'फिल्टर' प्रक्रिया से जमीन रजिस्ट्री में होने वाले फर्जीवाड़े में 90 प्रतिशत तक की कमी आएगी। अक्सर लोग गलत कागजात के आधार पर दूसरों की जमीन बेच देते थे, जिससे खरीदार कानूनी पचड़ों में फंस जाते थे। अब चूंकि सरकार खुद रजिस्ट्री से पहले मालिकाना हक की जांच करेगी, इसलिए जमीन खरीदना ज्यादा सुरक्षित और पारदर्शी हो जाएगा।