पितृपक्ष

गयाजी में ही है दुनिया का एक मात्र ऐसा मंदिर जहां होता है जीते जी अपना ही पिंडदान!

जीवित अवस्था में अपना पिंडदान करने की हजारों वर्ष पुरानी परम्परा है

By : Pramod Kumar , News11 Bharat
गयाजी में ही है दुनिया का एक मात्र ऐसा मंदिर जहां होता है जीते जी अपना ही पिंडदान!

न्यूज11  भारत

रांची/डेस्क: जी हैं, आपने बिल्कुल सुना! पितृपक्ष जो कि अब अपने अंतिम चरण में है. 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ सम्पन्न हो जाएगा. उसके बाद महालया और नवरात्रि का आरम्भ होगा. पितृपक्ष में दुनिया भर से गयाजी आकर लोग अपने पितरों का पिंडदान और श्राद्ध तर्पण कर रहे हैं. मगर इसी गयाजी में ही एक ऐसा मंदिर है जहां पितरों का नहीं, लोग जीते जी अपना ही पिंडदान करते हैं. 

यह प्रथा थोड़ी अजीब अवश्य लगती है, लेकिन अपना पिंडदान करने वालों की यहां कमी नहीं दिखती. मगर इसकी वजह भी है. दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं जिनका अपने पीछे अपना कहने वाला कोई नहीं होता. जब कोई अपना नहीं है तो जाहिर है जब वे इस दुनिया में नहीं रहेंगे तो उनकी आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण कौन करेगा. बस, इसी भावना के साथ लोग अपना पिंडदान लोग अपने जीते जी कर लेते हैं ताकि उनकी आत्मा को शांति मिल सके.
 
अब यह जान लेते हैं कि आखिर यह मंदिर कौन-सा है जहां आकर लोग अपना पिंडदान करते हैं. गयाजी का यह अनोखा मंदिर भगवान जनार्दन का मंदिर है. यह गया के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है. भगवान विष्णु का जनार्दन यहां विराजमान हैं. पितृ पक्ष में यहां भारी भीड़ रहती है. मान्यता है कि जनार्दन मंदिर में जो पिंडदान किया जाता है उसे भगवान खुद ग्रहण करते हैं. पिंडदान ग्रहण करने से याचक की आत्मा को मुक्ति मिलती है. सबसे बड़ी बात यह कि हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि कोई उनके नाम पिंडदान और तर्पण नहीं करता है तो तो उनकी आत्मा को भटकना पड़ता है. उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी. इसी मान्यता के कारण ही जनार्दन मंदिर में अपना पिंडदान करने की परम्परा शुरू हो गई. यह परम्परा आज की नही, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी परम्परा है. जीते जी पिंडदान करने के बाद उस व्यक्ति के नाम पर पिंडदान नहीं करना पड़ता है. 

इस अनुष्ठान को करने में तीन दिनों का समय लगता है. सबसे पहले यहां पर वैष्णव सिद्धि का संकल्प लिया जाता है. पापों का प्रायश्चित किया जाता है. इसके बाद पूरे विधि विधान के तहत पूजा-अर्चना और जाप होता है. और पिंडदान होता है. इस पिंडदान में तिल का इस्तेमाल नहीं होता. पिंडदान करने वाला व्यक्ति पिंडदान के बाद भगवान जनार्दन से यही कामना करता है कि वह उसके पापों के लिए क्षमा दान करें और मृत्यु के बाद अपने चरणों में स्थान दें ताकि उसकी आत्मा को शांति मिल सके.

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