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नई दिल्ली/डेस्क: मोदी सरकार द्वारा लाए गए महिला आरक्षण विधेयक के साथ परिसीमन लागू करने के मुद्दे पर संसद में लगातार दूसरे दिन जोरदार बहस देखने को मिली. विपक्ष ने आशंका जताई है कि परिसीमन की प्रक्रिया से दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व घट सकता है, जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि प्रस्तावित बदलाव से लोकसभा सीटों की कुल संख्या में वृद्धि होगी.
850 तक पहुंच सकती है लोकसभा की सीट
सरकार के अनुसार, वर्तमान में 543 सीटों वाली लोकसभा परिसीमन के बाद लगभग 850 सीटों तक पहुंच सकती है, जिससे महिला आरक्षण लागू करने का रास्ता आसान होगा. इस बीच विशेषज्ञों का कहना है कि सीटों की संख्या में बदलाव भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कोई नई बात नहीं है.
स्वतंत्रता के बाद आम चुनाव में लोकसभा की 489 सीटें थीं
स्वतंत्रता के बाद 1951-52 में हुए पहले आम चुनाव में लोकसभा की 489 सीटें थीं. इसके बाद 1957 में यह संख्या बढ़कर 494 हो गई और 1962 में भी यही बनी रही. 1967 में सीटों की संख्या बढ़कर 520 हो गई, जो उस समय बढ़ती आबादी और राजनीतिक विविधता का संकेत था.
1980 में हुई 543 सीटें
हालांकि, 1971 में सीटें घटकर 518 हो गईं, लेकिन 1977 तक यह संख्या बढ़कर 542 पहुंच गई. 1980 में लोकसभा का वर्तमान स्वरूप तय हुआ, जब कुल सीटें 543 कर दी गईं और तब से यही संख्या कायम है. इस क्रम में 1976 एक अहम मोड़ साबित हुआ, जब सरकार ने सीटों की संख्या पर 'फ्रीज' लगा दिया. परिवार नियोजन को बढ़ावा देने और राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से यह फैसला लिया गया था. पहले यह रोक 2001 तक थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 2026 तक कर दिया गया.
हालांकि, परिसीमन की प्रक्रिया के तहत निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदली जाती रहीं, लेकिन कुल सीटों की संख्या स्थिर रखी गई. अब प्रस्तावित बदलावों के साथ एक बार फिर प्रतिनिधित्व के स्वरूप में बड़े बदलाव की संभावना जताई जा रही है.
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