एक अखबार से शुरु हुई क्रांति, 200 साल बाद भी गूंज रही आवाज़-क्या था हिंदी पत्रकारिता का असली सच और बिहार की छिपी भूमिका?

हिंदी पत्रकारिता ने 200 वर्षों में समाज, राजनीति और जन-जागरण की दिशा बदल दी। बिहार इस इतिहास में एक मजबूत केंद्र बनकर उभरा, जिसने पत्रकारिता को नई सोच और आवाज दी

By : sawan kumar
एक अखबार से शुरु हुई क्रांति, 200 साल बाद भी गूंज रही आवाज़-क्या था हिंदी पत्रकारिता का असली सच और बिहार की छिपी भूमिका?

हिंदी पत्रकारिता

न्यूज 11 भारत / बिहार डेस्क 

सावन कुमार / पटना -  हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के इतिहास की शुरुआत 30 मई 1826 को प्रकाशित “उदंत मार्तण्ड” से मानी जाती है, जिसे पंडित युगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता से प्रकाशित किया था। यह भारत का पहला हिंदी समाचार पत्र माना जाता है, हालांकि लंबे समय तक इसके हिंदी स्वरूप और महत्व को लेकर भ्रम की स्थिति रही। प्रारंभ में कुछ विद्वान इसे बंगला पत्रकारिता से जोड़कर देखते थे, जबकि कुछ समय तक “बनारस अखबार” को पहला हिंदी पत्र मानने की धारणा भी प्रचलित रही।

बाद में शोध और दस्तावेज़ों के आधार पर यह स्पष्ट हुआ कि उदंत मार्तण्ड ही हिंदी पत्रकारिता की नींव था। हालांकि आर्थिक कठिनाइयों और पाठकों की कमी के कारण यह अखबार लंबे समय तक नहीं चल सका, लेकिन इसने हिंदी भाषा में समाचार लेखन की परंपरा की मजबूत शुरुआत कर दी। यही वह आधार था जिस पर आगे चलकर हिंदी पत्रकारिता का विशाल भवन खड़ा हुआ।

हाईलाइट्स -

  • हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने पर ऐतिहासिक सफर
  • 1826 में “उदंत मार्तण्ड” से शुरुआत
  • बिहार में पत्रकारिता और जन-जागरण का बड़ा योगदान
  • “बिहार बंधु” से आधुनिक मीडिया तक का विकास
  • स्वतंत्रता आंदोलन में प्रेस की निर्णायक भूमिका

 बिहार में हिंदी पत्रकारिता का उदय और सामाजिक चेतना

बिहार में हिंदी पत्रकारिता का व्यवस्थित विकास 19वीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुआ। 1872 में केशव राम भट्ट द्वारा पटना से प्रकाशित “बिहार बंधु” राज्य का पहला प्रमुख हिंदी समाचार पत्र माना जाता है। इसने समाज में व्याप्त कुरीतियों—जैसे बाल विवाह, जातिवाद और रूढ़िवाद—के खिलाफ जन-जागरण का कार्य किया। यह केवल समाचार पत्र नहीं बल्कि सामाजिक सुधार आंदोलन का माध्यम बन गया।

इसके बाद 1894 में सच्चिदानंद सिन्हा और महेश नारायण द्वारा “द बिहार टाइम्स” की स्थापना की गई। यह अंग्रेजी समाचार पत्र था, लेकिन इसका वैचारिक प्रभाव बिहार में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। इसने बिहार के प्रशासनिक अधिकारों और एक अलग राज्य की अवधारणा को वैचारिक मजबूती दी। इन प्रयासों ने बिहार को पत्रकारिता और राजनीतिक चेतना के केंद्र के रूप में स्थापित किया।

स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार की पत्रकारिता की भूमिका

20वीं सदी की शुरुआत में बिहार की पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आंदोलन में निर्णायक भूमिका निभाई। 1918 में प्रकाशित “सर्चलाइट” अखबार ने ब्रिटिश शासन की नीतियों और दमन के खिलाफ मुखर आवाज उठाई। यह पटना से प्रकाशित होने वाला एक प्रभावशाली अंग्रेजी दैनिक था, जिसने राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक समर्थन दिया।

इसी दौर में 1920 में भारत रत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा शुरू की गई पत्रिका “देश” ने स्वतंत्रता संग्राम को वैचारिक ऊर्जा प्रदान की। इस पत्रिका ने न केवल राजनीतिक चेतना जगाई, बल्कि ग्रामीण भारत तक राष्ट्रवाद का संदेश पहुँचाया। इसी समय बिहार के कई अन्य प्रकाशनों ने भी स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी और ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनमत तैयार किया।

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