सिस्टम की मार, पलामू में जर्जर आशियानों के भरोसे मानसून काटने को मजबूर बेबस गरीब परिवार

सिस्टम की मार

सिस्टम की मार, पलामू में जर्जर आशियानों के भरोसे मानसून काटने को मजबूर बेबस गरीब परिवार

मानसून ने अब लगभग दस्तक दे दी है. जहां एक तरफ देश-दुनिया में बारिश की फुहारों का स्वागत हो रहा है, वहीं झारखंड के पलामू जिले से एक बेहद दुःखद  तस्वीर सामने आ रही है.

सिस्टम की मार पलामू में जर्जर आशियानों के भरोसे मानसून काटने को मजबूर बेबस गरीब परिवार 

संतोष श्रीवास्तव/विकास/न्यूज11 भारत
पलामू/डेस्क:
मानसून ने अब लगभग दस्तक दे दी है. जहां एक तरफ देश-दुनिया में बारिश की फुहारों का स्वागत हो रहा है. वहीं झारखंड के पलामू जिले से एक बेहद दुःखद  तस्वीर सामने आ रही है. यहां कई गरीब परिवारों के लिए यह बारिश खुशहाली नहीं, बल्कि डर लेकर आ रही है. दरसअल सरकारी आवास के इंतजार में जर्जर और टूटे-फूटे मकानों में रह रहे ये परिवार हर पल किसी अनहोनी के साए में जीने को मजबूर हैं. 

आसमान में छाते काले बादल अमूमन लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाते हैं, लेकिन पलामू जिले के हुसैनाबाद प्रखंड की देवरी खुर्द पंचायत में कई परिवारो मे इन दिनों  चेहरे पर मायूसी व डर छाई हुई हैं पंचायत के पूर्णाडीह और देवरी खुर्द गांव के करीब एक दर्जन गरीब परिवारों की रातें इस चिंता में कट रही हैं कि कहीं इस मानसून में उनकी जर्जर छतें जमींदोज न हो जाएं. दीवारों में आ चुकी बड़ी-बड़ी दरारें और कच्ची छतों को गिरने से बचाने के लिए लगाए गए बांस के सहारे, इन ग्रामीणों की बेबसी को साफ बयां कर रहे हैं. आर्थिक तंगी के कारण ये बेबस परिवार अपने स्तर से मकानों की मरम्मत तक कराने में पूरी तरह असमर्थ हैं.

हैरानी की बात यह है कि इन जरूरतमंदों का नाम सरकारी कागजों में तो दर्ज है, लेकिन धरातल पर इन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला है. कई परिवारों का नाम 'अबुआ आवास योजना' की सूची में शामिल होने के बावजूद उन्हें फंड की कमी बताकर लाभ से वंचित रखा गया है. वहीं कुछ अन्य पात्र परिवार 'प्रधानमंत्री आवास योजना' की प्रतीक्षा सूची में तो हैं, लेकिन उनका नंबर इतना नीचे है कि उनका नंबर आते-आते योजना का आवंटन ही खत्म हो जाता है. ऐसे में कागजी पेचीदगियों और सरकारी फंड के अभाव के बीच इन गरीबों का आशियाना सिर्फ एक सपना बनकर रह गया है.

इस पूरे गंभीर मामले पर स्थानीय जनप्रतिनिधि यानी मुखिया ममता देवी भी खुद को लाचार पा रही हैं. उन्होंने साफ तौर पर स्वीकार किया है कि पंचायत में करीब दस ऐसे अत्यंत गरीब परिवार हैं जिन्हें तत्काल सुरक्षित आवास की जरूरत है. मुखिया के अनुसार, अबुआ आवास योजना में फिलहाल फंड उपलब्ध नहीं है और पीएम आवास की सूची में इन लोगों का नाम बहुत नीचे होने के कारण तुरंत लाभ मिलना नामुमकिन बना हुआ है. इसके अलावा आंबेडकर आवास और मछुआरा आवास जैसी अन्य योजनाओं के लिए भी संबंधित अधिकारियों को लिखित जानकारी दी गई थी, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई. अब मुखिया एक बार फिर हुसैनाबाद बीडीओ, स्थानीय विधायक और पलामू उपायुक्त से मिलकर इन परिवारों के लिए प्राथमिकता के आधार पर घर की मांग करने की बात कह रही हैं.

मानसून की शुरुआत हो चुकी है और अगले कुछ ही दिनों में पलामू में भी मूसलाधार बारिश का दौर शुरू हो जाएगा. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल हमारे सिस्टम की कार्यशैली पर उठता है, जो हमेशा 'आग लगने के बाद कुआं खोदने' और 'हादसे के बाद राहत बांटने' का काम करता है. जब ये गरीब ग्रामीण सालों से अपनी जान बचाने की गुहार लगा रहे हैं, तो वक्त रहते प्रशासन ने कोई वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की? यह प्रशासनिक विफलता का वह क्रूर चेहरा है, जिसकी सीधी मार हमेशा समाज के सबसे गरीब और अंतिम पायदान पर खड़े परिवार को झेलनी पड़ती है. विडंबना देखिए कि जब इस सिस्टम से सवाल करो तो कोई जवाब नहीं मिलता, और जवाब मिलते-मिलते इन लाचार गरीबों की आस और आशियाना दोनों ही टूट जाते हैं.

अब देखना यह होगा कि इस खबर के सामने आने के बाद पलामू जिला प्रशासन वक्त रहते कोई कदम उठाता है, या फिर इन गरीब परिवारों को इस बार भी अपनी जान हथेली पर रखकर इस पूरे मानसून के खौफ को झेलना पड़ेगा.

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