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रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने करीब 15 साल पुराने आर्म्स एक्ट और सीएलए एक्ट के मामले में जय गणेश लोहरा को बड़ी राहत दी है. अदालत ने उनकी दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सजा को उनके द्वारा जेल में बिताई गई छह महीने की अवधि तक सीमित कर दिया है. हाईकोर्ट ने कहा कि यह उनका पहला अपराध था, कोई आपराधिक पूर्व इतिहास नहीं था और 2017 में जमानत मिलने के बाद उनके खिलाफ किसी प्रतिकूल आचरण की बात सामने नहीं आई.
2011 में वाहन चेकिंग के दौरान हुई थी गिरफ्तारी
मामला 3 मई 2011 का है. पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी और नवाडीह मोड़ पर वाहनों की जांच की जा रही थी. इसी दौरान पुलिस ने एक व्यक्ति को होंडा शाइन मोटरसाइकिल से संदिग्ध स्थिति में आते देखा. पुलिस ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने वाहन की रफ्तार बढ़ा दी. पीछा करने के बाद उसे पकड़ लिया गया. उसकी पहचान जय गणेश लोहरा के रूप में हुई.
पुलिस के अनुसार, तलाशी के दौरान मोटरसाइकिल की सीट के नीचे से एक देसी पिस्तौल, .315 बोर का जिंदा कारतूस और नक्सली साहित्य व किताबें बरामद हुई थीं. इसके बाद आर्म्स एक्ट की धारा 25(1-B)(a), 26 और सीएलए एक्ट की धारा 17 के तहत मामला दर्ज किया गया.
ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत ने भी माना था दोषी
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की. ट्रायल के दौरान अभियोजन की ओर से पांच गवाहों की गवाही कराई गई और कई दस्तावेज पेश किए गए. ट्रायल कोर्ट ने जय गणेश लोहरा को आर्म्स एक्ट और सीएलए एक्ट की धाराओं में दोषी ठहराया. बाद में उन्होंने अपील की, लेकिन अपीलीय अदालत ने भी उनकी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा. इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन दाखिल किया.
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि में दखल नहीं दिया
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और दोनों निचली अदालतों के फैसले की समीक्षा के बाद माना कि जय गणेश लोहरा के कब्जे से देसी पिस्तौल और जिंदा कारतूस बरामद हुए थे. विशेषज्ञ जांच में पिस्तौल चालू हालत में पाई गई और कारतूस भी जिंदा था. आरोपी के पास हथियार रखने का कोई लाइसेंस नहीं था और वह इसके संबंध में कोई वैध स्पष्टीकरण भी नहीं दे सके.
अदालत ने यह भी कहा कि केवल इसलिए अभियोजन का मामला कमजोर नहीं हो जाता कि जब्ती सूची के गवाहों की अदालत में गवाही नहीं हुई. जांच अधिकारी ने जब्ती सूची पर गवाहों के हस्ताक्षर की पुष्टि की थी. इस आधार पर हाईकोर्ट ने आर्म्स एक्ट की धारा 25(1-B)(a)/26 और सीएलए एक्ट की धारा 17 के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी.
6 महीने की जेल को ही पर्याप्त सजा माना
सजा के सवाल पर हाईकोर्ट ने आरोपी के पक्ष में कई परिस्थितियों को देखा. अदालत ने माना कि यह उनका पहला अपराध था और उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था. वह ट्रायल और दोषसिद्धि के बाद कुल छह महीने जेल में रह चुके थे. 19 जून 2017 को उन्हें जमानत मिली थी और उसके बाद उनके किसी प्रतिकूल आचरण की जानकारी भी अभियोजन ने रिकॉर्ड पर नहीं रखी. इन परिस्थितियों को देखते हुए न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने सजा को पहले से जेल में बिताई गई छह महीने की अवधि तक सीमित कर दिया. हालांकि, दोषसिद्धि बरकरार रहने के कारण हाईकोर्ट ने रिवीजन याचिका को मेरिट पर खारिज किया, लेकिन सजा में संशोधन कर दिया.
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