न्यूज़11 भारत
रांची/डेस्क: नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने झारखंड की DGP को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में हुई सुनवाई पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर पोस्ट किया है. उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा कि तदाशा मिश्रा जी, आज सर्वोच्च न्यायालय में झारखंड के डीजीपी नियुक्ति मामले की बहस आपने भी सुनी होगी. अपनी कुर्सी बचाने की इस कवायद में आपकी और राज्य सरकार की कैसी भद्द पिट रही है, यह अब किसी से छिपा नहीं है. झारखंड की जनता सब देख रही है, सब समझ रही है.
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि आज अदालत ने साफ कहा कि डीजीपी की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों से संचालित होती है और हर राज्य को यह बताना होगा कि उसने उन निर्णयों का पालन किया है या नहीं. पीठ ने राज्य सरकार से यह भी पूछा कि पुलिस अधिनियम के तहत डीजीपी नियुक्ति के नियम बनाने का कानूनी आधार आखिर क्या है. इतने वरिष्ठ और महंगे वकीलों की फौज खड़ी करने के बावजूद अदालत के सवालों से सरकार बच नहीं सकी. सरकार को अपने फैसले का कानूनी आधार स्पष्ट करना होगा. महंगे वकीलों की संख्या बढ़ा देने से गैरकानूनी फैसले वैध नहीं हो जाते और जवाबदेही खत्म नहीं हो जाती.
उन्होंने आगे कहा कि तदाशा जी, डीजीपी की कुर्सी पर नाम भले आपका हो, लेकिन झारखंड की पुलिस व्यवस्था की असली कमान मुख्यमंत्री आवास में बैठे बाल आरक्षी (सिपाही) से एएसआई बने अजय सिंह के हाथों में बताई जा रही है. फिर सवाल उठता है कि आप एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी होकर सत्ता की कठपुतली क्यों बनी हुई हैं? वर्दी पहनकर भी यदि निर्णय कहीं और ( एक सिपाही ) से हो रहा है, तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है? अदालत अपना निर्णय करेगी, लेकिन अपनी वर्दी, पद और सेवा-जीवन की गरिमा बचाने का निर्णय आप आज भी ले सकती हैं.
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि अनुराग गुप्ता जी का हश्र देखिए. आज सार्वजनिक जीवन में उनकी कारगुजारियों पर कैसी थू-थू हो रही है, इस पर गौर कीजिए. इतिहास किसी को माफ नहीं करता. कुर्सी कुछ दिनों की होती है, लेकिन बदनामी स्थायी हो जाती है. अब भी समय है. इतिहास में अपना नाम काले अक्षरों में दर्ज होने से बचाइए. स्वतः इस्तीफा दीजिए और अपनी भी लाज रखिए, झारखंड की भी.
तदाशा मिश्रा जी,
आज सर्वोच्च न्यायालय में झारखंड के डीजीपी नियुक्ति मामले की बहस आपने भी सुनी होगी। अपनी कुर्सी बचाने की इस कवायद में आपकी और राज्य सरकार की कैसी भद्द पिट रही है, यह अब किसी से छिपा नहीं है। झारखंड की जनता सब देख रही है, सब समझ रही है।
आज अदालत ने साफ कहा कि डीजीपी की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों से संचालित होती है और हर राज्य को यह बताना होगा कि उसने उन निर्णयों का पालन किया है या नहीं। पीठ ने राज्य सरकार से यह भी पूछा कि पुलिस अधिनियम के तहत डीजीपी नियुक्ति के नियम बनाने का कानूनी आधार आखिर क्या है। इतने वरिष्ठ और महंगे वकीलों की फौज खड़ी करने के बावजूद अदालत के सवालों से सरकार बच नहीं सकी।
सरकार को अपने फैसले का कानूनी आधार स्पष्ट करना होगा। महंगे वकीलों की संख्या बढ़ा देने से गैरकानूनी फैसले वैध नहीं हो जाते और जवाबदेही खत्म नहीं हो जाती।
तदाशा जी, डीजीपी की कुर्सी पर नाम भले आपका हो, लेकिन झारखंड की पुलिस व्यवस्था की असली कमान मुख्यमंत्री आवास में बैठे बाल आरक्षी (सिपाही) से एएसआई बने अजय सिंह के हाथों में बताई जा रही है। फिर सवाल उठता है कि आप एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी होकर सत्ता की कठपुतली क्यों बनी हुई हैं? वर्दी पहनकर भी यदि निर्णय कहीं और ( एक सिपाही ) से हो रहा है, तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है?
अदालत अपना निर्णय करेगी, लेकिन अपनी वर्दी, पद और सेवा-जीवन की गरिमा बचाने का निर्णय आप आज भी ले सकती हैं।
अनुराग गुप्ता जी का हश्र देखिए। आज सार्वजनिक जीवन में उनकी कारगुजारियों पर कैसी थू-थू हो रही है, इस पर गौर कीजिए। इतिहास किसी को माफ नहीं करता। कुर्सी कुछ दिनों की होती है, लेकिन बदनामी स्थायी हो जाती है।
अब भी समय है। इतिहास में अपना नाम काले अक्षरों में दर्ज होने से बचाइए। स्वतः इस्तीफा दीजिए और अपनी भी लाज रखिए, झारखंड की भी।
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— Babulal Marandi (@yourBabulal) September 29, 2026