संतोष श्रीवास्तव/न्यूज़ 11 भारत
पलामू/डेस्क: आज मेदिनीनगर में स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता और लाचारी का एक ऐसा खौफनाक चेहरा सामने आया, जिसने पूरी व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है.
दो दिन के एक बेबस नवजात को लेकर एक निजी अस्पताल की एंबुलेंस शहर के कई अस्पतालों के चक्कर लगाती रही, लेकिन उसे कहीं भी दाखिला नहीं मिल सका. आखिरकार पलामू के किसी भी अस्पताल में जगह न मिलने के कारण गंभीर रूप से बीमार बच्चे को रांची रेफर किया गया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. सूचना के अनुसार, रांची ले जाने के दौरान रास्ते में ही उस मासूम ने दम तोड़ दिया.
इस हृदयविदारक घटना की शुरुआत दो दिन पहले मइयां बाबू नामक अस्पताल से हुई थी, जहां इस बच्चे का जन्म हुआ था. अस्पताल के डॉक्टर के मुताबिक, प्रसूता को समय से पहले ही प्रसव पीड़ा (लेबर पेन) शुरू हो गई थी, जिसके कारण आनन-फानन में ऑपरेशन (सिजेरियन) कर डिलीवरी करानी पड़ी. समय से पहले जन्म लेने के कारण बच्चा पूरी तरह स्वस्थ नहीं था और उसने जन्म के बाद सामान्य रूप से रोना भी शुरू नहीं किया था. इसके बावजूद, जिस मइयां बाबू अस्पताल में बच्चे का जन्म हुआ, वहां इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए कोई बुनियादी चिकित्सा सुविधा या पुख्ता इंतजाम मौजूद नहीं थे.
मजबूरी में परिजनों को नवजात को लेकर दूसरे अस्पतालों की खाक छाननी पड़ी. जन्म के बाद उसे एक निजी अस्पताल के एनआईसीयू (NICU) में रखकर इलाज शुरू तो किया गया, लेकिन शुक्रवार को उस अस्पताल ने भी हाथ खड़े कर दिए और बच्चे को आगे रेफर कर दिया. इसके बाद परिजन गंभीर हालत में नवजात को लेकर दोपहर में पहले विनायक चाइल्ड अस्पताल पहुंचे, वहां जगह नहीं मिली तो एमएमसीएच भागे. इसके बाद एलीट अस्पताल के चाइल्ड एंड मदर क्लीनिक में भी मिन्नतें की गईं, लेकिन पलामू के किसी भी अस्पताल ने उस तड़पते बच्चे को अपनाने की जहमत नहीं उठाई. जब कहीं रास्ता नहीं सूझा, तो परिजन बेबसी में उसे वापस उसी मइयां बाबू अस्पताल ले गए जहां उसकी मां अब भी भर्ती थी, लेकिन वहां सुविधाओं का टोटा होने के कारण उसे रांची ले जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा. पर समय से इलाज न मिलने के कारण वह नन्हा जीवन रांची पहुंचने से पहले ही रास्ते में बुझ गया.
यह पूरी घटना पलामू संभाग में कुकुरमुत्ते की तरह खुल रहे प्राइवेट अस्पतालों की जमीनी हकीकत को बयां करती है. चंद पैसों के लालच में बड़ी-बड़ी इमारतें तानकर कई निजी अस्पताल तो खुल जाते हैं, लेकिन जब बात क्रिटिकल केयर या आपातकालीन स्थितियों की आती है, तो इनकी व्यवस्थाएं पूरी तरह दुरुस्त नहीं मिलतीं. डॉक्टरों और संसाधनों की भारी कमी के कारण आए दिन जच्चा और बच्चा, दोनों की जान दांव पर लगी रहती है. जैसा कि इस झकझोर देने वाले मामले में हुआ कि सिस्टम की नाकामी और अस्पतालों की लापरवाही के कारण आखिरकार एक मासूम की जान चली गई. अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि इस मौत का जिम्मेदार कौन है, इस नवजात की मौत का जिम्मा कौन लेगा और पलामू की इस दम तोड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था को आखिर कौन सुधारेगा.