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रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने 4.50 लाख रुपये के चेक बाउंस मामले में श्याम लाल को दोषी ठहराए जाने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है. हाईकोर्ट के न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने उसकी आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और उसे बची हुई सजा काटने के लिए दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का आदेश दिया है.
दोस्त से लिए थे 4.50 लाख रुपये
मामला वर्ष 2009 का है. शिकायतकर्ता सुरेंद्र लाल और श्याम लाल एक-दूसरे को जानते थे. शिकायत के अनुसार, श्याम लाल ने जरूरत बताकर सुरेंद्र लाल से फरवरी 2009 में 4.50 लाख रुपये उधार लिए थे. इसके बदले उसने 2 जून 2009 का 4.50 लाख रुपये का चेक दिया था.
जब चेक बैंक में जमा किया गया तो खाते में पर्याप्त पैसे नहीं होने के कारण वह बाउंस हो गया. बैंक ने 5 जून 2009 को चेक लौटाया. इसके बाद शिकायतकर्ता ने कानूनी नोटिस भेजकर पैसे लौटाने की मांग की, लेकिन भुगतान नहीं हुआ.
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी 6 महीने की सजा
मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने 4.50 लाख रुपये की लेन-देन की रसीद, मूल चेक, बैंक का रिटर्न मेमो और कानूनी नोटिस समेत कई दस्तावेज पेश किए.
ट्रायल कोर्ट ने 17 जून 2013 को श्याम लाल को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत दोषी माना. उसे 6 महीने की कठोर जेल और शिकायतकर्ता को 4.50 लाख रुपये मुआवजा देने की सजा दी गई. मुआवजा नहीं देने पर एक साल की अतिरिक्त कठोर जेल का प्रावधान किया गया.
हाईकोर्ट में क्या रखा गया था पक्ष?
श्याम लाल की ओर से कहा गया कि शिकायतकर्ता के पास 4.50 लाख रुपये देने की आर्थिक क्षमता साबित नहीं हुई. यह भी कहा गया कि निचली अदालतों ने बचाव पक्ष के सबूतों और शिकायतकर्ता के बयान में मौजूद विरोधाभासों पर ठीक से ध्यान नहीं दिया.
दूसरी ओर, राज्य और शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि निचली अदालत और अपीलीय अदालत ने सबूतों को सही तरीके से देखा है और दोषसिद्धि में कोई गलती नहीं है.
हाईकोर्ट ने क्यों बरकरार रखी सजा?
हाईकोर्ट ने कहा कि चेक और पैसे की रसीद पर श्याम लाल के हस्ताक्षर को लेकर विवाद नहीं था. ऐसे में कानून के तहत यह माना जाता है कि चेक किसी देनदारी के भुगतान के लिए दिया गया था. आरोपी इस कानूनी धारणा को ठोस सबूतों से गलत साबित नहीं कर सका.
कोर्ट ने यह भी माना कि मामले की सुनवाई के तरीके में कोई कानूनी गलती नहीं हुई है. निचली अदालत और अपीलीय अदालत के फैसले रिकॉर्ड और सबूतों के आधार पर सही हैं. इसलिए हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि में दखल देने से इनकार कर दिया.
दो महीने में करना होगा सरेंडर
हाईकोर्ट ने श्याम लाल की याचिका खारिज कर दी. चूंकि वह अभी जमानत पर था, कोर्ट ने उसका जमानत बांड रद्द कर दिया और दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का आदेश दिया है. ऐसा नहीं करने पर ट्रायल कोर्ट उसकी गिरफ्तारी के लिए कार्रवाई कर सकता है.
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