अब होर्मुज के भरोसे अब नहीं रहेगा भारत, ओमान से गुजरात तक बिछेगी 2,000 किमी लंबी अंडरसी गैस पाइपलाइन

By : Ark Sahuliyar
अब होर्मुज के भरोसे अब नहीं रहेगा भारत, ओमान से गुजरात तक बिछेगी 2,000 किमी लंबी अंडरसी गैस पाइपलाइन

न्यूज11 भारत
नई दिल्ली/डेस्क: प
श्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है. देश अब ओमान और गुजरात को जोड़ने वाली एक महत्वाकांक्षी गहरे समुद्र की गैस पाइपलाइन परियोजना पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, जिसका उद्देश्य प्राकृतिक गैस की स्थिर और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना है.

अरब सागर के नीचे प्रस्तावित यह पाइपलाइन करीब 2,000 किलोमीटर लंबी होगी और सीधे ओमान को भारत के पश्चिमी तट से जोड़ेगी. लंबे समय से चर्चा में रही इस परियोजना को अब नया प्रोत्साहन मिला है, क्योंकि परियोजना समर्थक समूह SAGE ने समुद्र तल के सर्वेक्षण, तकनीकी मूल्यांकन और वित्तीय व्यवहार्यता से जुड़े महत्वपूर्ण अध्ययन पूरे कर लिए हैं.

 पिछले करीब तीन दशकों में इस योजना पर कई बार विचार किया गया, लेकिन भारी लागत, जटिल इंजीनियरिंग चुनौतियों और व्यावसायिक व्यवहार्यता से जुड़ी चिंताओं के कारण इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका. हालांकि, बदलते वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य और आपूर्ति सुरक्षा की जरूरतों ने इस परियोजना को फिर से केंद्र में ला दिया है.

40,000 करोड़ रुपये का अनुमानित निवेश
प्रस्तावित ओमान-गुजरात डीप-सी गैस पाइपलाइन पर लगभग 40,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है. यह दुनिया की सबसे गहरी समुद्री गैस पाइपलाइन परियोजनाओं में शामिल हो सकती है. इसके जरिए भारत को प्राकृतिक गैस की दीर्घकालिक और विश्वसनीय आपूर्ति मिलने की संभावना है, जबकि खाड़ी देशों और भारत के बीच एक सीधा ऊर्जा कॉरिडोर भी विकसित हो सकता है. भारत के लिए यह परियोजना इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होने वाली ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भरता कम हो सकती है. वर्तमान में भारत के ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर आता है.

क्यों अहम है यह परियोजना?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है. कच्चे तेल के साथ-साथ देश प्राकृतिक गैस और एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) का भी बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगाता है. इन आपूर्तियों का प्रमुख स्रोत खाड़ी क्षेत्र है, जहां से ईंधन होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए भारतीय बाजार तक पहुंचता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस रणनीतिक समुद्री मार्ग में किसी भी प्रकार की बाधा आने पर वैश्विक ऊर्जा बाजारों में उथल-पुथल मच सकती है. इसका असर तेल और गैस की कीमतों, शिपिंग लागत और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन पर तुरंत दिखाई दे सकता है.

समुद्र की गहराइयों में बनेगा ऊर्जा मार्ग
इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता इसकी असाधारण गहराई है. प्रस्तावित मार्ग का कुछ हिस्सा समुद्र तल से 3,000 मीटर से अधिक नीचे गुजर सकता है. इतनी गहराई पर पाइपलाइन बिछाना तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है और इसके लिए अत्याधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों की जरूरत होगी. यदि परियोजना सफलतापूर्वक पूरी होती है, तो यह समुद्री ऊर्जा अवसंरचना के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हो सकती है और भारत की ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था को अधिक सुरक्षित तथा विविधतापूर्ण बनाने में मदद करेगी.

गैस परिवहन की लागत कितनी होगी?
परियोजना से जुड़े प्रारंभिक अनुमानों के अनुसार, पाइपलाइन के माध्यम से प्राकृतिक गैस के परिवहन की लागत लगभग 2 से 2.25 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू के बीच रह सकती है. हालांकि अंतिम लागत निर्माण खर्च, वित्तपोषण मॉडल और भविष्य में गैस की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर निर्भर करेगी. दीर्घकालिक आपूर्ति समझौतों के तहत संचालित होने वाली यह परियोजना भारत को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने का अवसर दे सकती है, जबकि ओमान को एक स्थायी और बड़े निर्यात बाजार तक सीधी पहुंच उपलब्ध कराएगी.

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