न्यूज 11 भारत / बिहार डेस्क
सावन कुमार / राजनैतिक विश्लेषण - भारतीय राजनीति के फलक पर कुछ ही ऐसे व्यक्तित्व होते हैं जो समय की गति को अपने पक्ष में मोड़ने का हुनर जानते हैं। Nitish Kumar उन्हीं विरले राजनेताओं में से एक हैं। 10 अप्रैल 2026 को जब उन्होंने राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ली, तो यह केवल एक पद का परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक महान राजनीतिक यात्रा के 'पूर्ण चक्र' (Full Circle) की प्राप्ति थी। 1989 में 'बाढ़' लोकसभा क्षेत्र से शुरू हुआ एक सांसद का सफर, बिहार की सत्ता के शीर्ष पर दो दशकों तक रहने के बाद, आज फिर संसद के गलियारों में लौट आया है।
- नीतीश कुमार ने 10 अप्रैल 2026 को राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेकर अपने राजनीतिक सफर का “Full Circle” पूरा किया।
- 1989 में Barh Lok Sabha constituency से सांसद के रूप में शुरू हुआ सफर, अब फिर संसद तक पहुंचा।
- 2005 से बिहार की सत्ता संभालते हुए “सुशासन बाबू” की छवि बनाई और विकास मॉडल स्थापित किया।
- सड़क, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण (साइकिल योजना) जैसे फैसलों से सामाजिक बदलाव की नींव रखी।
- NDA और महागठबंधन के बीच राजनीतिक संतुलन बनाकर 20 वर्षों तक सत्ता की धुरी बने रहे।
- 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर एक बड़ा राजनीतिक रिकॉर्ड कायम किया।
- लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद—चारों सदनों के सदस्य रहने का दुर्लभ कीर्तिमान हासिल किया।
- 14 अप्रैल 2026 को संभावित इस्तीफे के साथ बिहार की राजनीति में एक युग का अंत माना जा रहा है।
- दिल्ली की राजनीति में वापसी के साथ “किंग” से “किंगमेकर” की भूमिका में नजर आने की संभावना।
- राष्ट्रीय स्तर पर उनकी अगली राजनीतिक पारी पर देशभर की नजरें टिकी हुई हैं।
10 अप्रैल 2026 को जब उन्होंने राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ली
संघर्ष से सुशासन तक
नीतीश कुमार का सफर संघर्ष और सुशासन की एक अनूठी गाथा है। 1970 के दशक के जेपी आंदोलन की भट्टी में तपे नीतीश ने जब 1989 में पहली बार लोकसभा की सीढ़ियां चढ़ी थीं, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह 'इंजीनियर' एक दिन बिहार की नियति बदल देगा। 2005 में जब उन्होंने बिहार की कमान संभाली, तब राज्य 'लालटेन युग' के अंधेरे और अराजकता से जूझ रहा था। उन्होंने 'सुशासन बाबू' की छवि गढ़ी, सड़कों का जाल बिछाया और बेटियों के हाथ में साइकिल थमाकर सामाजिक क्रांति की नींव रखी।
प्रयोगधर्मी राजनीति के केंद्र में नीतीश
नीतीश कुमार की आलोचना उनके 'पलटवार' और गठबंधन बदलने को लेकर अक्सर होती रही है, लेकिन हकीकत यह है कि बिहार की राजनीति पिछले 20 वर्षों से उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती रही। चाहे वे एनडीए में रहे हों या महागठबंधन में, सत्ता की धुरी हमेशा '1-अणे मार्ग' (मुख्यमंत्री आवास) ही रही। 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना कोई सामान्य घटना नहीं है; यह उनकी स्वीकार्यता और परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने की अद्भुत क्षमता का प्रमाण है।
प्रयोगधर्मी राजनीति के केंद्र में नीतीश
चारों सदनों का अनुभव
दुर्लभ राजनीतिक कीर्तिमान राज्यसभा सदस्य बनते ही नीतीश कुमार ने वह दुर्लभ उपलब्धि हासिल कर ली है जो बहुत कम राजनेताओं के पास है। वे अब उन महापुरुषों की श्रेणी में हैं जो लोकतंत्र के चारों सदनों—लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद—के सदस्य रह चुके हैं। यह दर्शाता है कि उन्होंने राजनीति के हर धरातल और हर सदन की मर्यादा को जिया है।
दिल्ली वापसी—नई भूमिका, नई पारी
14 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री पद से संभावित इस्तीफे और दिल्ली की सक्रिय राजनीति में वापसी के साथ ही बिहार में एक युग का अंत हो रहा है। वे अब 'किंग' की भूमिका से निकलकर 'किंगमेकर' या एक राष्ट्रीय मार्गदर्शक की भूमिका में दिखेंगे। उनका अनुभव केंद्र सरकार और संसद के लिए एक बड़ी संपत्ति साबित होगा।
जड़ों की ओर वापसी
अनुभव और अपेक्षाओं का संगम नीतीश कुमार का 'सांसद से सांसद' तक का यह सफर केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि एक अनुभवी राजनेता का अपनी जड़ों की ओर लौटना है। बिहार ने उन्हें बहुत कुछ दिया, और उन्होंने बिहार को एक नई पहचान दी। अब जब वे संसद के उच्च सदन में बैठेंगे, तो उनके पास न केवल फाइलों का अनुभव होगा, बल्कि करोड़ों लोगों की उम्मीदों और बदलते बिहार की जीती-जागती तस्वीर भी होगी।
अगली पारी पर देश की नजरें
राजनीति के इस मंझे हुए खिलाड़ी की अगली पारी पर अब पूरे देश की नजरें टिकी हैं। नीतीश कुमार ने राज्यसभा में शपथ लेकर अपने राजनीतिक सफर का ‘फुल सर्कल’ पूरा किया, जहां 1989 में सांसद के रूप में शुरुआत हुई थी। मुख्यमंत्री से सांसद बनने के साथ अब उनकी भूमिका राष्ट्रीय राजनीति में ‘किंगमेकर’ के तौर पर देखी जा रही है।
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