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रांची/डेस्कः- प्रशांत किशोर के उपर बीजेपी के बी टीम होने का आरोप चुनाव के दोरान लगते रहा है. इस बात में कितनी सच्चाई है आइए जानते हैं. 14 नवंबर को बिहार विधानसभा चुनाव में घोषित हुए नतीजे न सिर्फ महागठबंधन के लिए अप्रत्याशित है बल्कि जनसुराज पार्टी के लिए भी अप्रत्याशित रहा है. 238 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली जनसुराज पार्टी की एक भी सीट पर जीत नही हो पाई. 236 सीटों पर जमानत जब्त हो गए. बावजूद इसके 35 सीटों पर वोटकटवा साबित हो गए. जनसुराज ने दोनों गठबंधनों को नुकसान पहुंचाया है. विपक्ष बीजेपी का एजेंट के रुप में आरोप लगाती है. कभी मोदी के पोल स्ट्रैटेजिस्ट पीके 2022 में जेएसपी लांच कर बिहार में बदलाव का नारा दिया था. उन्होने ये भी दावा किया था कि पार्टी अर्श पर रहेगी या फर्श पर.
पीके की पार्टी ने कुल 3.5 फीसदी वोट लाया
पीके के जनसुराज ने जिन 238 सीटों पर चुनाव लड़ा, उसमें से 236 सीटों पर जमानत जब्त हो गई. आंकड़ों से ये संकेत भी मिलता है कि कई सीटों पर कई जनसुराज ने खेल बिगाड़ने वाला काम भी किया है. 35 विधानसभा सीटों पर पार्टी के वोट जीत के अंतर से भी अधिक थे. इनमें से एनडीए ने 19 सीट जीती वही महागठबंधन ने 15 सीटें जीती. पार्टी कुल 3.5 वोट लाया. वहीं कांग्रेस का वोट प्रतिशत 8.3 प्रतिशत रहा.
पार्टी 115 सीटों पर तीसरे नंबर पर रही
हालांकि निश्चित रुप से ये कहना बड़ा मुश्किल होगा कि जनसुराज को किसी सीट पर अधिक वोट मिलने पर किसे फायदा मिला. ये जानना बिल्कुल असंभव है कि जो वोट पीके को मिले अगर जनसुराज को न मिलता तो किस पार्टी को मिलता. पार्टी 115 सीटों पर तीसरे नंबर पर रही. इसलिए अगर प्रशांत किशोर को एक खेल बिगाड़ने वाला पार्टी के रुप में देखा जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी. शुरुआत में लगभग हर राजनीतिक पार्टी का परफोर्मेंस एसा ही रहता है.
'नौवीं फेल तेजस्वी' का नरेटिव बनाना
पीके ने अपने चुनाव अभियान में लगातार तेजस्वी यादव को नौवीं फेल का तंज कसते हुए जंगल राज का डर दिखा कर ऐसा माहौल बनाया कि आरजेडी की युवा अपील को ध्वस्त कर दिया. जेएसपी का 3.5 प्रतिशत वोट शेयर वोटकटवा बनकर महागठबंधन को 10-15 सीटें खर्च करा गया. पीके ने सोशल मीडिया व रैलियों के माध्यम से आरजेडी की छवि को अशिक्षित व जंगल राज वाला बना दिया.
जंगल राज का डर दिखाकर 1990 के दशक के लालू काल के अपराध व भ्रष्टाचार की यादें ताजा कर दिया
किशोर ने तेजस्वी की शिक्षा पर सीधा हमला बोलते हुए बोला कि 2015 मे उप सीएम बनने के बाद अपनी नौवी कक्षा की असफलता को सामान्य बताया था लेकिन वहीं पीके ने इसे अक्षमता का प्रतीक बता दिया. अक्टूबर 2025 की रैलियों में पीके ने कहा कि नौवीं फेल नेता बिहार में नौकरी देंगे. युवा वोटर जो तेजस्वी को नई पीढ़ी मानते हैं इस बयान को अपमानजनक रुप में ले लिया. यही नेरेटिव आरजेडी के वोट शेयर को 5 प्रतिशत गिरा दिया. वहीं तेजस्वी ने कहा शिक्षा डिग्री से नहीं काम से आती है. पीके ने लालू के जंगल राज का डर दिखाकर 1990 के दशक के लालू काल के अपराध व भ्रष्टाचार की यादें ताजा कर दी.
सीमित लेवल पर बीजेपी का विरोध
वहीं पीके ने बीजेपी के विरोध को सिमित स्तर तक रखा पीके का फोकस नीतिश व तेजस्वी पर ज्यादा रहा. पीके ने बीजेपी नेता सम्राट चौधरी पर तमाम तरह के गंभीर आरोप भी लगाए,वहीं मोदी व शाह के खिलाफ खुलकर सामने नहीं आए. यही महागठबंधन के खिलाफ नेरेटिव बनाने जैसा रहा.
नीतीश को ज्यादा तरजीह देना
महागठबंधन के दुर्गति का एक कारण ये भी रहा कि पीके ने तेजस्वी को 9वीं फैल व जंगलराज का वीरिस ठहराकर नीतिश के सुशासन को चमका दिया, चुनाव के दौरान किसी ने पीके से सवाल किया कि नीतिश व तेजस्वी में से किसी एक को चुनना हो तो किसे चुनेंगे. इस पर पीके ने नीतिश कुमार को चुना था शायद इसी का फायदा भी एनडीए को मिला हो.
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