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रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि पत्नी का बार-बार अपने मायके जाना अपने आप में वैवाहिक क्रूरता नहीं है. इसी तरह पत्नी की यह इच्छा कि पति उसके मायके में आकर घरजमाई बनकर रहे, केवल इच्छा होने के आधार पर पति के साथ मानसिक क्रूरता नहीं मानी जा सकती.
कोर्ट ने कहा कि तलाक के लिए क्रूरता इतनी गंभीर होनी चाहिए कि पति-पत्नी का एक साथ रहना मुश्किल या असहनीय हो जाए.
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने हजारीबाग फैमिली कोर्ट के उस फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें पति की ओर से क्रूरता के आधार पर मांगी गई तलाक की मांग को खारिज कर दिया गया था. इसके साथ ही पति की ओर से मामले में दायर अपील भी खारिज कर दी गई.
2008 में हुई थी शादी, 2013 से अलग रह रहे थे दंपती
मामले के अनुसार राहुल चौबे और पूनम पाठक की शादी 21 नवंबर 2008 को पटना में हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी. दोनों से एक बेटी का जन्म हुआ, जिसका नाम आकृति चौबे है. शादी के बाद दोनों हजारीबाग के मेरू स्थित बीएसएफ कैंप में साथ रहने लगे थे.
पति का आरोप था कि शादी के कुछ समय बाद पत्नी बार-बार पटना स्थित अपने मायके जाने लगी. बाद में उसे पता चला कि पत्नी के माता-पिता चाहते हैं कि वह अपने माता-पिता को छोड़कर पटना आए और उनके घर घरजमाई बनकर रहे.
पति ने अदालत में कहा कि उसके माता-पिता बुजुर्ग और बीमार थे तथा उनकी देखभाल के लिए कोई दूसरा व्यक्ति नहीं था. इसलिए उसने पटना जाकर घरजमाई के रूप में रहने की पत्नी और उसके परिवार की कथित इच्छा को स्वीकार नहीं किया.
पति के अनुसार पत्नी 24 फरवरी 2013 को पटना गई और इसके बाद वैवाहिक घर वापस नहीं लौटी. उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी पटना में नौकरी कर रही थी और वहीं रहना चाहती थी. इसी आधार पर उसने मानसिक क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की.
फैमिली कोर्ट ने तलाक देने से किया था इनकार
पति ने हजारीबाग फैमिली कोर्ट में हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13(1)(i-a) के तहत तलाक की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था. पत्नी को नोटिस भेजा गया और बाद में अखबार में भी नोटिस प्रकाशित कराया गया. पत्नी के अदालत में उपस्थित नहीं होने के बाद 17 मई 2022 को उसके खिलाफ एकतरफा कार्रवाई शुरू की गई.
पति ने खुद समेत दो गवाहों को अदालत में पेश किया. इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने माना कि पति अपनी पत्नी की ओर से की गई कथित क्रूरता को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर पाया.
इसके बाद 16 जुलाई 2022 को फैसला सुनाया गया और 1 अगस्त 2022 को आदेश की औपचारिक प्रति तैयार की गई. इसके खिलाफ पति ने झारखंड हाईकोर्ट में अपील दायर की.
पति की दलील - पत्नी ने वैवाहिक जीवन छोड़ दिया
हाईकोर्ट में पति की ओर से दलील दी गई कि फैमिली कोर्ट ने मामले के तथ्यों को सही तरीके से नहीं समझा. उसके अनुसार पत्नी ने वर्ष 2013 से उसके साथ रहना छोड़ दिया था और वह बार-बार उसे पटना आकर घरजमाई के रूप में रहने के लिए कहती थी.
पति की ओर से यह भी कहा गया कि उसके बूढ़े और बीमार माता-पिता उस पर निर्भर थे. इसलिए उनके साथ रहना छोड़कर पटना जाना उसके लिए संभव नहीं था. पत्नी का इस बात पर जोर देना उसके लिए मानसिक परेशानी और क्रूरता का कारण था.
पति के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के Narendra v. K. Meena फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि पत्नी द्वारा पति को उसके परिवार से अलग करने का लगातार प्रयास मानसिक क्रूरता माना जा सकता है.
पति की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि दोनों लंबे समय से अलग रह रहे हैं और उनका वैवाहिक रिश्ता लगभग पूरी तरह टूट चुका है. इसके लिए Naveen Kohli v. Neeta Kohli और Samar Ghosh v. Jaya Ghosh जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया गया.
पत्नी का पक्ष - उल्टे पति और ससुराल वालों ने किया प्रताड़ित
हाईकोर्ट में पत्नी की ओर से अदालत की मदद के लिए नियुक्त वकील ने फैमिली कोर्ट के फैसले का बचाव किया. पत्नी की ओर से कहा गया कि उसने पति या उसके परिवार के साथ कोई क्रूरता नहीं की थी. बल्कि शादी के बाद उसे पति और ससुराल वालों की ओर से कथित प्रताड़ना का सामना करना पड़ा.
दलील में कहा गया कि पति और ससुर शराब के नशे में उसके साथ दुर्व्यवहार करते थे और यह सब उसकी बेटी के सामने भी होता था. बेटी के जन्म के बाद पति के व्यवहार में कथित तौर पर बदलाव आया और पत्नी को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा.
पत्नी की ओर से यह भी कहा गया कि उसे जब जानकारी मिली कि पति दूसरी शादी करने की तैयारी कर रहा है, तो उसने पुलिस में आवेदन देकर खुद को उसकी कानूनी पत्नी बताते हुए प्रस्तावित दूसरी शादी रोकने का अनुरोध किया था.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि पत्नी की ओर से अदालत में कहा गया कि वह विवाह तोड़ना नहीं चाहती और अभी भी पति के साथ सम्मानजनक वैवाहिक जीवन जीना चाहती है.
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक क्रूरता का कोई एक तय पैमाना नहीं हो सकता. हर मामले के तथ्यों, पति-पत्नी की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों, उनके जीवन के तरीके तथा पारिवारिक और मानवीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर यह तय करना होता है कि किसी व्यवहार को क्रूरता माना जा सकता है या नहीं.
अदालत ने कहा कि सामान्य वैवाहिक जीवन में होने वाली छोटी-मोटी परेशानियां, मतभेद या आपसी असहमति अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं बन जातीं. कोर्ट ने Joydeep Majumdar v. Bharti Jaiswal Majumdar के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि क्रूरता का व्यवहार इतना गंभीर होना चाहिए कि उससे दूसरे जीवनसाथी के लिए साथ रहना अनुचित या असहनीय हो जाए. सामान्य वैवाहिक जीवन की छोटी परेशानियां और रोजमर्रा के मतभेद तलाक का आधार नहीं बन सकते.
‘हर दुल्हन को मायके जाने का अधिकार’
इस मामले में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की उस टिप्पणी को स्वीकार किया, जिसमें कहा गया था कि पत्नी का अपने मायके जाना एक सामान्य और वैध अधिकार है.
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि पत्नी बार-बार अपने मायके जाती थी, इसे पति के प्रति क्रूरता नहीं माना जा सकता.
अदालत ने कहा कि पत्नी का अपने मायके जाना अपने आप में ऐसा व्यवहार नहीं है, जिससे पति को तलाक का अधिकार मिल जाए.
घरजमाई बनने की पत्नी की इच्छा भी क्रूरता नहीं
मामले में पति की प्रमुख शिकायत यह थी कि पत्नी और उसके परिवार वाले चाहते थे कि वह पटना जाकर घरजमाई बनकर रहे.
इस पर हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि समाज में घरजमाई की प्रथा पुरानी है, लेकिन किसी व्यक्ति का घरजमाई बनकर रहना या न रहना उसकी अपनी पसंद है.
कोर्ट के अनुसार, इस मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं था कि पति को जबरन घरजमाई बनाकर रखने के लिए मजबूर किया गया था. इसलिए सिर्फ पत्नी की इच्छा कि पति उसके मायके में आकर रहे, अपने आप में वैवाहिक क्रूरता नहीं है.
पति आरोप साबित नहीं कर पाए : हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने उपलब्ध सबूतों और गवाहों के बयानों को देखने के बाद कहा कि पति कथित क्रूरता को पर्याप्त रूप से साबित करने में सफल नहीं हुए.
अदालत ने माना कि फैमिली कोर्ट ने उपलब्ध सबूतों को सही तरीके से देखा था और उसका निष्कर्ष ऐसा नहीं था जिसे सबूतों के बिल्कुल विपरीत या कानून के खिलाफ कहा जाए.
कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट के पास निचली अदालत के फैसले में तथ्यों और कानून से जुड़ी गलतियों को देखने का अधिकार है. लेकिन इस मामले में फैमिली कोर्ट के फैसले में ऐसा कोई गंभीर दोष नहीं मिला, जिसके कारण उसमें बदलाव किया जाए.
नौ साल से अधिक अलग रहने की दलील भी काम नहीं आई
पति की ओर से यह तर्क भी दिया गया था कि दोनों लंबे समय से अलग रह रहे हैं और उनका वैवाहिक रिश्ता लगभग टूट चुका है. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के Naveen Kohli और Samar Ghosh के फैसलों का हवाला दिया गया था.
लेकिन हाईकोर्ट ने इस आधार पर भी फैमिली कोर्ट के फैसले में बदलाव नहीं किया. अदालत ने मुख्य रूप से यह देखा कि इस मामले में पति द्वारा लगाए गए क्रूरता के आरोप पर्याप्त सबूतों से साबित नहीं हुए.
अदालत ने कहा कि तलाक के लिए वैवाहिक क्रूरता सामान्य वैवाहिक जीवन के उतार-चढ़ाव से कहीं अधिक गंभीर होनी चाहिए.
हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज की
सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि पति अपनी पत्नी द्वारा की गई कथित क्रूरता को साबित करने में विफल रहे हैं.
अदालत ने माना कि फैमिली कोर्ट ने उपलब्ध सबूतों का सही तरीके से मूल्यांकन किया और उसके फैसले में बदलाव की जरूरत नहीं है.
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने 16 जुलाई 2022 के फैमिली कोर्ट के फैसले और 1 अगस्त 2022 की आदेश की प्रति को बरकरार रखा और पति की अपील खारिज कर दी. लंबित आवेदन भी निस्तारित कर दिया गया.
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