विरेन्द्र शर्मा/न्यूज़11 भारत
बरही/डेस्क: चौपारण क्षेत्र में सनातन धर्म में अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है. ग्राम पंचायत झापा की पूर्व मुखिया पूर्णिमा देवी ने आज वट सावित्री व्रत के अवसर पर एक बयान जारी किया. उन्होंने बताया कि वर्ष 2026 में उत्तर भारत में वट सावित्री व्रत 16 मई, यानी आज शनिवार को मनाया जा रहा है, क्योंकि ज्येष्ठ अमावस्या उदयातिथि के अनुसार इसी दिन पड़ रही है. उन्होंने बताया कि पूजा का सबसे उत्तम समय सुबह 07:12 बजे से 08:24 बजे तक रहेगा.
वट सावित्री व्रत का धार्मिक महत्व
पूर्णिमा देवी ने वट सावित्री व्रत के महत्व और कथा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट (बरगद) वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों का वास होता है. इसी पवित्र वृक्ष के नीचे बैठकर माता सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे. इसी कारण सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए वट वृक्ष की पूजा करती है.
पूजा विधि और सामग्री
इस व्रत में पूजा की थाली में भीगा हुआ चना, गुड़, रोली, मौली (कलावा), सिन्दूर, धूप-दीप, फल और लाल रंग का धागा या सूत अवश्य शामिल किया जाता है. वट वृक्ष (बरगद) की जड़ में जल अर्पित किया जाता है. इसके बाद वृक्ष के तने पर रोली और सिन्दूर का तिलक लगाया जाता है तथा फल और भीगे चने अर्पित किए जाते है. महिलाएं हाथ में रक्षा सूत्र (कलावा) लेकर वट वृक्ष की 7 या 11 बार परिक्रमा करती हैं और वृक्ष में कलावा बांधकर अपने पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य की कामना करती है.
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