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बरवाडीह /डेस्क: बेतला नेशनल पार्क क्षेत्र के निवासी एवं राखी हथनी के पूर्व महावत मकसुद आलम आज रोजगार के अभाव में गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं. कभी जंगल और वन्यजीवों की सेवा में पूरी निष्ठा से कार्य करने वाले मकसुद आलम आज परिवार के भरण-पोषण के लिए दर-दर ठोकरें खाने को मजबूर हैं. उन्होंने वन विभाग के अधिकारियों से पुनः महावत के रूप में काम देने की मांग करते हुए अपनी पीड़ा सार्वजनिक की है.
मकसुद आलम, पिता मोहम्मद शरीफ मियां, वर्ष 2016 में तब चर्चा में आए थे जब उन्हें बेतला नेशनल पार्क की हथनी 'राखी' की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. उस समय हथनी की उम्र मात्र एक सप्ताह थी. मकसुद आलम ने लगातार लगभग तीन वर्षों तक पूरी लगन और जिम्मेदारी के साथ उसकी सेवा की. उन्होंने बताया कि हथनी के चारा, पानी, भोजन और देखरेख की जिम्मेदारी वे ईमानदारी से निभाते रहे और उसे परिवार के सदस्य की तरह संभाला.
इसी दौरान एक दिन हथनी के भोजन की व्यवस्था करने के लिए वे करीब 100 मीटर ऊंचे बरगद के पेड़ पर चढ़े थे. अचानक संतुलन बिगड़ने से वे नीचे गिर पड़े, जिससे उनके हाथ-पैर गंभीर रूप से टूट गए. हादसे के बाद उन्हें करीब एक माह तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा. मकसुद आलम का आरोप है कि इलाज के दौरान वन विभाग की ओर से केवल औपचारिकता निभाई गई और किसी प्रकार की पर्याप्त आर्थिक सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई. लंबे इलाज और आय के अभाव के कारण उनके परिवार के सामने खाने-पीने तक का संकट उत्पन्न हो गया.
उन्होंने बताया कि स्वस्थ होने के बाद जब वे दोबारा वन विभाग कार्यालय पहुंचे और काम की मांग की, तो कुछ दिनों के लिए कार्य तो दिया गया, लेकिन मजदूरी का भुगतान नहीं किया गया. न ही इलाज में खर्च हुए पैसों की भरपाई की गई. इसके बाद से वे लगातार बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं और रोजगार के लिए विभिन्न अधिकारियों से गुहार लगा चुके हैं.पत्रकारों से बातचीत करते हुए मकसुद आलम ने कहा कि पिछले लगभग दस वर्षों से वे स्थायी रोजगार के बिना जीवन यापन कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि जंगल और हथनी राखी से उनका भावनात्मक जुड़ाव है और यदि उन्हें फिर से महावत के रूप में मौका दिया जाए तो वे पूरी निष्ठा से अपनी जिम्मेदारी निभाने को तैयार हैं.
मकसुद आलम ने बेतला नेशनल पार्क के डिप्टी डायरेक्टर प्रजेश कांत जैना तथा प्रभारी रेंजर उमेश कुमार दुबे से मामले की जांच कर पुनः रोजगार देने की मांग की है. उनका कहना है कि यदि उन्हें काम मिल जाता है तो उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है और वे फिर से सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे.स्थानीय लोगों का भी कहना है कि वर्षों तक वन्यजीव सेवा में जुड़े कर्मियों की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए. अब देखना यह है कि वन विभाग इस मामले में क्या कदम उठाता है और एक पूर्व महावत को न्याय मिल पाता है या नहीं.
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