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रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने निवेश के नाम पर रुपये लेने और रकम वापस नहीं करने के मामले में फैसला सुनाया है. न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की कोर्ट ने संजय भट्टाचार्जी की चेक बाउंस से जुड़ी के मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखी है. वहीं उसके पिता साधन चंद्र भट्टाचार्जी को पर्याप्त सबूत नहीं मिलने पर आरोपों से बरी कर दिया है.
पूरा मामला क्या था?
मामला जमशेदपुर के बिकाश कुमार गुहा से जुड़ा है. बिकाश कुमार गुहा Atomic Minerals Division, Department of Atomic Energy में कर्मचारी थे. साधन चंद्र भट्टाचार्जी भी उसी विभाग में उनके सहकर्मी थे. दोनों के बीच अच्छे संबंध थे. साधन अक्सर अपने बेटे संजय भट्टाचार्जी के साथ बिकाश के घर आते-जाते थे.
कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, साधन ने अपने बेटे संजय को अलग-अलग गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों, LIC, KVP और NSC का एजेंट बताते हुए बिकाश को निवेश के लिए तैयार किया. उन्हें भरोसा दिलाया गया कि इन योजनाओं में पैसा लगाने से बेहतर रिटर्न मिलेगा. इसके बाद बिकाश ने अलग-अलग चेक के जरिए रकम दी. कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, कुल 2,07,400 रुपये निवेश के लिए दिए गए थे. आरोप था कि रकम लेने के बाद आरोपियों ने संबंधित बॉन्ड और प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं कराए. बाद में संजय भट्टाचार्जी ने 51,000 रुपये का चेक दिया, लेकिन खाते में पर्याप्त पैसा नहीं होने के कारण चेक कई बार बाउंस हो गया.
निचली अदालत ने दोनों को दोषी माना था
इस मामले में जमशेदपुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 22 जुलाई 2008 को संजय और साधन भट्टाचार्जी को दोषी ठहराया था. इसके बाद जमशेदपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-II ने 28 फरवरी 2015 को अपील खारिज कर निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था.
हाईकोर्ट ने पिता को किया बरी
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल अपने बेटे का परिचय कराने या शिकायतकर्ता के साथ दोस्ती और सहकर्मी का संबंध होने से साधन चंद्र भट्टाचार्जी की आपराधिक मंशा साबित नहीं होती. उनके खिलाफ रकम लेने या गबन करने का पर्याप्त स्वतंत्र सबूत भी नहीं मिला. इसलिए कोर्ट ने उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया.
संजय की दोषसिद्धि बरकरार, धारा 420 में राहत
हाईकोर्ट ने संजय भट्टाचार्जी के खिलाफ धारा 406 IPC और धारा 138 N.I. Act की दोषसिद्धि बरकरार रखी. कोर्ट ने माना कि शिकायतकर्ता की गवाही, चेक से जुड़े दस्तावेज और 51 हजार रुपये का चेक बाउंस होने से उनकी जिम्मेदारी साबित होती है. हालांकि, कोर्ट ने धारा 420 IPC के तहत संजय की दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी. अदालत ने माना कि मामले में आपराधिक विश्वासघात के लिए जरूरी बातें साबित हुईं, लेकिन धोखाधड़ी के अपराध के लिए जरूरी तत्व साबित नहीं हुए. हाईकोर्ट ने क्रिमिनल रिवीजन को आंशिक रूप से मंजूर किया. संजय भट्टाचार्जी को दो महीने के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण कर शेष सजा भुगतने का निर्देश दिया गया है.
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