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रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के 23 साल पुराने एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने वन विभाग के पूर्व फॉरेस्टर बागेश्वर पांडेय को बड़ी राहत देते हुए निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया है और उन्हें सभी आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया है.
क्या था मामला और क्यों हुई थी सजा?
यह मामला साल 1992 में निगरानी थाना में दर्ज किया गया था. आरोप था कि बागेश्वर पांडेय ने साल 1963 से 1988 के बीच वन विभाग (डालटनगंज और लातेहार डिवीजन के चटकपुर बीट व मारू रेंज) में Forester के पद पर रहते हुए अपने, अपनी पत्नी और बेटों के नाम पर 21 एकड़ 40 डेसिमल जमीन और कई चल संपत्तियां (स्कूटर, जेनरेटर, बंदूक आदि) खरीदी थीं.
विजिलेंस का दावा था कि उन्होंने अपनी कानूनी आय से अलग 1,17,690 रुपये की अवैध संपत्ति अर्जित की थी. इस मामले में 13 नवंबर 2003 को रांची की विशेष विजिलेंस कोर्ट ने उन्हें दोषी पाते हुए 2 साल के कारावास की सजा सुनाई थी. इस फैसले के खिलाफ बागेश्वर पांडेय ने 2003 में ही हाईकोर्ट में अपील दायर की थी.
हाईकोर्ट ने क्यों किया बाइज्जत बरी?
हाईकोर्ट ने मामले के सभी साक्ष्यों और गवाहों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पाया कि विजिलेंस विभाग आरोपों को साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है. कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई भी ठोस दस्तावेजी सबूत पेश नहीं कर सका जिससे यह साबित हो कि बालेश्वर पांडेय ने अपनी ज्ञात आय से अधिक संपत्ति अर्जित की थी.
जांच के दौरान सामने आया कि आरोपी के पास गांव में लगभग 50 से 63 एकड़ पुश्तैनी कृषि भूमि थी, जिसमें उनका 1/4 हिस्सा था. इसके अलावा वे दूध, लाह (Lac) के व्यवसाय और खेती से सालाना अच्छी आय अर्जित करते थे, जिसे विजिलेंस ने अपनी जांच में नजरअंदाज कर दिया था.
अदालत ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत ने बिना किसी पुख्ता दस्तावेजी साक्ष्य के, केवल गवाहों के मौखिक बयानों के आधार पर सजा सुना दी थी, जो कानून की नजर में सही नहीं है.
अदालत का अंतिम आदेश
हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट, 1988 की धारा 13(1)(e) के तहत जरूरी आरोपों को साबित करने में 'बुरी तरह विफल' रहा है. अदालत ने निचली अदालत के दोषसिद्धि के आदेश को खारिज करते हुए बालेश्वर पांडेय को तुरंत बेल बॉन्ड की देनदारियों से मुक्त करने का आदेश दिया.
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