1928 के सेटलमेंट रिकॉर्ड में हेरफेर का मामला: कोर्ट ने दिया 7 दिनों में FIR दर्ज करने का आदेश

रिकॉर्ड में हेरफेर

1928 के सेटलमेंट रिकॉर्ड में हेरफेर का मामला: कोर्ट ने दिया 7 दिनों में FIR दर्ज करने का आदेश

वर्ष 1928 के सेटलमेंट रिकॉर्ड में कथित हेरफेर और जालसाजी से जुड़े एक गंभीर मामले में आखिरकार अदालत के हस्तक्षेप के बाद FIR दर्ज करने का आदेश दिया गया है

1928 के सेटलमेंट रिकॉर्ड में हेरफेर का मामला कोर्ट ने दिया 7 दिनों में fir दर्ज करने का आदेश

न्यूज़11 भारत 
रांची/डेस्क:
वर्ष 1928 के सेटलमेंट रिकॉर्ड में कथित हेरफेर और जालसाजी से जुड़े एक गंभीर मामले में आखिरकार अदालत के हस्तक्षेप के बाद FIR दर्ज करने का आदेश दिया गया है. यह मामला सारले मौजा के कुल 21 एकड़ जमीन से जुड़ा है, जिसमें 12 एकड़ रैयती और 9 एकड़ सरकारी भूमि शामिल है.

आरोप है कि मूल सेटलमेंट आदेश में दर्ज नाम को काटकर किसी अन्य व्यक्ति का नाम जोड़ दिया गया. दस्तावेज़ में ओवरराइटिंग, कटिंग और अलग पेन से नाम जोड़ने जैसी कई अनियमितताएं पाई गईं, जिसे बाद में लैमिनेट कर सुरक्षित रखने की कोशिश की गई, ताकि छेड़छाड़ छुपाई जा सके.

मामले में पावर ऑफ अटॉर्नी धारक द्वारा वर्ष 2013 में निजी स्तर पर कराए गए फॉरेंसिक जांच में भी हस्ताक्षर में गड़बड़ी की पुष्टि हुई थी. इसके आधार पर डीसी और एसपी को आवेदन दिया गया. एसपी के निर्देश पर सदर थाना ने प्रारंभिक जांच में FIR दर्ज कर फॉरेंसिक जांच की जरूरत बताई थी.

इसके बाद डीसी द्वारा गठित जांच समिति, जिसमें LRDC और रिकॉर्ड रूम के अधिकारी शामिल थे, ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से ओवरराइटिंग, कटिंग और दस्तावेज़ में छेड़छाड़ की पुष्टि की. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मूल आदेश के बाद अलग पेन से एक व्यक्ति का नाम जोड़ा गया है. डीसी ने 2019 में SDO को नियम के तहत कार्रवाई करने और एसी को फॉरेंसिक जांच कराने का निर्देश दिया, लेकिन इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया. आवेदक लगातार आवेदन देते रहे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.

2022 में मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने स्पष्ट किया कि फॉरेंसिक जांच जांच प्रक्रिया (इन्वेस्टिगेशन) का हिस्सा है और बिना FIR के इसे आदेशित नहीं किया जा सकता. इसके बाद आवेदक ने FIR दर्ज कराने के लिए पुलिस और एसपी के समक्ष प्रयास किए, लेकिन सफलता नहीं मिली.

अंततः 15 जून 2025 को मजिस्ट्रेट कोर्ट में आवेदन दायर किया गया. नए प्रावधानों के तहत मामला संबंधित अधिकारियों के खिलाफ होने के कारण वरिष्ठ अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी गई, लेकिन एक साल तक रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई, बावजूद इसके कि कई बार रिमाइंडर भेजे गए.

चीफ जुडिशियल मैजिस्ट्रेट राजीव त्रिपाठी की कोर्ट में सुनवाई के दौरान आवेदक की ओर से सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया गया, जिसमें ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य केस का उल्लेख करते हुए कहा गया कि संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलने पर FIR दर्ज करना पुलिस के लिए अनिवार्य है. साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि रिपोर्ट के इंतजार में अनिश्चितकाल तक मामले को लंबित नहीं रखा जा सकता. अदालत ने इन दलीलों से सहमत होते हुए हजारीबाग जिला रिकॉर्ड रूम के अज्ञात अधिकारियों के खिलाफ 7 दिन में FIR दर्ज करने और उसकी जानकारी कोर्ट को देने का निर्देश दिया है. शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजेश मिश्रा और प्रत्युष शौणिक्य ने पक्ष रखा.

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