पंकज कुमार/न्यूज11 भारत
घाघरा/डेस्क: घाघरा थाना क्षेत्र के पनवारी गांव में रविवार को एक ऐसा मंजर सामने आया, जिसने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था और आपात सेवाओं की पोल खोलकर रख दी. नदी में नहाने के दौरान 9 वर्षीय मासूम सेजल मुंडा की डूबकर मौत हो गई, लेकिन मौत के बाद जो हुआ, वह हादसे से भी ज्यादा झकझोर देने वाला था. सेजल गांव के अन्य बच्चों के साथ नदी में नहाने गया था. खेल-खेल में वह गहराई की ओर बढ़ता चला गया और देखते ही देखते पानी में समा गया. बच्चों के शोर मचाने पर ग्रामीण पहुंचे और काफी मशक्कत के बाद उसे नदी से बाहर निकाला गया. उम्मीद थी कि शायद उसकी सांसें बच जाएं. परिजन आनन-फानन में सेजल को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, घाघरा लेकर पहुंचे, लेकिन यहां पहुंचते ही डॉक्टरों ने बच्चे को मृत घोषित कर दिया. मौत की खबर सुनते ही मां की चीखें अस्पताल परिसर में गूंज उठीं.
एक एंबुलेंस, वह भी नदारद सबसे बड़ा सवाल तब खड़ा हुआ, जब शव को ले जाने के लिए अस्पताल में एंबुलेंस तक उपलब्ध नहीं थी. बताया गया कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में केवल एक ही एंबुलेंस है, जो पहले से ही किसी अन्य मरीज को लेकर बाहर गई हुई थी. बेटे की मौत को स्वीकार नहीं कर पा रही मां, सेजल के शव को गोद में उठाकर “एंबुलेंस… एंबुलेंस…” चिल्लाती हुई अस्पताल से बाहर निकल पड़ी. यह दृश्य किसी एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी की तस्वीर था.
सड़क पर मां, गोद में लाश
एंबुलेंस नहीं मिलने पर मां बच्चे के शव को गोद में लेकर मुख्य सड़क की ओर दौड़ पड़ी. किस्मत से लोहरदगा की ओर से आ रही एक एंबुलेंस मिल गई, जिसमें बैठकर वह गुमला रवाना हुई. सवाल यह है कि अगर वह एंबुलेंस न मिलती, तो क्या होता?
डॉक्टर ने क्या कहा इस संबंध में
चिकित्सक सुनील प्रसाद ने बताया कि बच्चे की मौत अस्पताल लाए जाने से पहले ही हो चुकी थी. बावजूद इसके, आपात व्यवस्था की बदहाली ने परिजनों के दर्द को कई गुना बढ़ा दिया.
सवालों के घेरे में सिस्टम
क्या एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए सिर्फ एक एंबुलेंस काफी है आपात स्थिति में अगर वही एंबुलेंस बाहर हो तो विकल्प क्या है
क्या गरीब और ग्रामीण परिवारों की जिंदगी की कीमत इतनी ही है पनवारी गांव में घटना के बाद मातम पसरा हुआ है. एक मासूम की मौत ने फिर साबित कर दिया कि
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