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रांची/डेस्क: कितनी बार आपने खुद से या दोस्तों से सुना होगा- "पासवर्ड तो वही, बाकी सब नया!" हां, यह सुनने में हल्का-फुल्का मजाक लगता है लेकिन इसमें हमारी यादें, भावनाएं और छोटे-छोटे मानसिक खेल भी छुपे होते हैं. कभी सोचा है कि क्यों कुछ लोग अपने डिजिटल जीवन में भी पुराने रिश्तों की परछाई छोड़ जाते है बिना जाने? यही रोजमर्रा की आदतें और दिमाग के अनदेखे पैटर्न एक अलग ही कहानी बयां करते हैं. आज के डिजिटल दौर में पासवर्ड हमारी सबसे निजी पहचान है फोन हो, ईमेल हो, बैंकिंग ऐप या लैपटॉप, सब कुछ एक सीक्रेट कोड पर टिका है लेकिन हैरानी की बात यह है कि लाखों लोग इतने पर्सनल पासवर्ड तक में अपने एक्स पार्टनर, पुराने क्रश या बीते प्यार की यादें संजोकर रखते हैं. मतलब रिश्ता खत्म, बातें खत्म, मुलाकातें खत्म लेकिन पासवर्ड में एक्स का नाम अब भी जिंदा!
सवाल उठता है ऐसा क्यों?
क्या ये सिर्फ एक आदत है, एक लापरवाही है या फिर दिमाग का कोई इमोशनल खेल? साइकोलॉजिस्ट्स और बिहेवियर एक्सपर्ट्स कहते है कि एक्स के नाम वाला पासवर्ड सिर्फ एक तकनीकी कमजोरी नहीं बल्कि मन की वो परछाई है, जो रिश्ते के खत्म होने के बाद भी मिटती नहीं हैं.
दिमाग दिल से पासवर्ड चुनता है लॉजिक से नहीम
ब्रेकअप के बाद लोग कोशिश करते है आगे बढ़ने की लेकिन दिमाग के ऑटो-पायलट मोड में एक्स का नाम कहीं गहरे हिस्से में सुरक्षित रह जाता हैं. जब पासवर्ड बनाने की बारी आती है तो दिमाग वही चुनता है जो सबसे जल्दी याद आये, सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुआ हो या सबसे गहराई से दिमाग में अंकित हो और अक्सर ये नाम वही होता है- एक्स लवर, पहली मोहब्बत या जिनसे सबसे ज्यादा भावनाएं जुड़ी हो.
तेजी से याद आने वाली मेमोरी
साइकोलॉजिस्ट्स का कहना है कि रिलेशनशिप में किसी नाम को रोज-रोज बोलना, लिखना, सुनना उसे “मसल्स मेमोरी” की तरह दिमाग में फिक्स कर देता हैं. ब्रेकअप हो जाने पर भी दिमाग आदत के उसी पैटर्न पर चलता हैं. इसलिए जब पासवर्ड टाइप करने का समय आता है, एक्स का नाम ऑटोमैटिकली उभर आता हैं.
अधूरा लगाव और नॉस्टैल्जिया
भले ही रिश्ता खत्म हो चुका हो, भावनाओं का हिसाब इतनी जल्दी खत्म नहीं होता. दिमाग नाम जैसे “सिंबल्स” को तुरंत जाने नहीं देता. जो लोग ब्रेकअप के बाद भी बार-बार अतीत को याद करते है, वे अक्सर अनजाने में ऐसा पासवर्ड रखते है, जिससे वे उस व्यक्ति की याद से जुड़े रहें. यह दिमाग का अपना तरीका है “कुछ भी बदल गया, लेकिन मैं अभी भी ठीक हूं” कहने का.
हिडन लिंक या कंट्रोल का एहसास
कुछ लोग एक्स के नाम को पासवर्ड बनाकर एक सीक्रेट कनेक्शन बनाए रखते है- एक प्राइवेट लिंक, जिसे सिर्फ वे ही जानते हैं. यह तीन तरह की मानसिक स्थितियों में होता है-रिश्ते को पूरी तरह खत्म न स्वीकार पाना, दिल में बची हुई कमज़ोरी को छुपाना या फिर नए पार्टनर के प्रति हल्की-फुल्की नाराजगी या पैसिव-एग्रेसन यानी बाहर से सब नॉर्मल दिखता है, लेकिन अंदर कहीं न कहीं एक “छुपा हुआ रिश्ता” अब भी सांस ले रहा होता हैं.
दर्द को दबाने का तरीका
जो लोग भावनाओं को सीधे सामना नहीं कर पाते वे ब्रेकअप की पीड़ा से बचने के लिए ऐसे छोटे-छोटे प्राइवेट रास्ते बनाते है, जैसे एक्स का नाम पासवर्ड, पुरानी चैट्स न डिलीट करना या यादों की कोई चीज संभालकर रखना. ये चीजें उन्हें छोटे पल भर का कम्फर्ट देती है, लेकिन आगे चलकर मूव-ऑन को धीमा कर देती हैं.
अपनी कहानी, अपनी आइडेंटिटी का हिस्सा
कुछ लोगों के लिए पासवर्ड एक तरह का ‘पर्सनल कोड’ होता हैं. उनका पहला प्यार, कोई गहरा रिश्ता, या कोई खास नाम उनके अंदरूनी संसार का हिस्सा बन जाता हैं. ऐसे लोग पासवर्ड बदलते समय भी उस कहानी को मिटाना नहीं चाहते. उन्हें लगता है कि एक्स का नाम एक ऐसे चैप्टर की याद है, जिसने उन्हें बदला, परिपक्व किया और उनकी पहचान का एक हिस्सा बन गया.
क्या कहते है साइबर एक्सपर्ट?
भावनात्मक कारण चाहे जो भी हो साइबर सिक्योरिटी की नजर से ऐसे पासवर्ड बेहद कमजोर होते हैं. यह हैकर्स की “पहली गेस” होती हैं. इसलिए विशेषज्ञ सलाह देते है कि एक्स का नाम, पेट नेम्स, डेट ऑफ रिलेशनशिप, फेवरेट सॉन्ग या कोई भी इमोशनल एंकर पासवर्ड में बिल्कुल नहीं रखना चाहिए.
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