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रांची/डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए फैसला दिया कि कार्यस्थलों पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न मामले से जुड़ा अधिनियम 2013 राजनीतिक दलों पर लागू नहीं सकता है. मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ में इस याचिका पर सुनवाई हुई थी जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि अगर इस अधिनियम के दायरे में राजनीति दलों को ला दिया गया तो यह ब्लैकमेल करने का एक बड़ा साधन बन जायेगा. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को और स्पष्ट करते हुए कहा कि राजनीतिक दल सिर्फ एक संगठन है, यहां पर नियोक्ता और कर्मचारी जैसा कोई रिश्ता नहीं होता. वहां कोई रोजगार भी नहीं होता और न ही वेतन दिया जाता है. इसलिए राजनीति दलों को कार्यस्थल नहीं माना जा सकता. इसलिए अगर इसे कार्यस्थल की तरह मान कर अधिनियम को लागू कर दिया गया तो यह यह कानून विवादों का जड़ बन जायेगा और शिकायतें दर्ज कराना का पिटारा खुल जाएगा.
एडवोकेट योगमाया एम.जी. केरल HC फैसले के खिलाफ पहुंची थीं SC
बता दें कि यह मामला एडवोकेट योगमाया एम.जी. से जुड़ा हुआ है. जो पहले केरल हाईकोर्ट पहुंची थी, लेकिन वहां से उन्हें निराशा हाथ लगी थी, जिसके बाद उन्होंने केरल हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थीं. केरल हाईकोर्ट ने भी स्पष्ट किया था कि राजनीतिक दलों पर कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीडऩ (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 लागू नहीं होता, क्योंकि वहां लोगों केबीच नियोक्ता और कर्मचारी जैसा कोई संबंध नहीं होता है.
दिसम्बर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों के लिए दिया था सुझाव
सुप्रीम कोर्ट में दिसंबर 2024 में भी इसी तरह की याचिका दायर हुई थी. जिस पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता को भारत के चुनाव आयोग से संपर्क करने का सुझाव दिया था. कोर्ट का कहना था कि चुनाव आयोग मान्यता प्राप्त दलों से यौन उत्पीडऩ संबंधी शिकायतों के निपटारे के लिए आंतरिक तंत्र तैयार करने की अपेक्षा करता है.