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रांची/डेस्क: लिव-इन रिलेशनशिप से शब्द अब भारत में अपरिचित नहीं है. भले ही इसे भारतीय समाज में अच्छी नजर से न देखा जाता हो, लेकिन पश्चिमी देशों की यह संस्कृति चुपके से अपनी पैठ बना चुकी है. यह पाश्चात्य संस्कृति सिर्फ बड़े शहरों का ही हिस्सा नहीं है, छोटे शहर भी इसकी चपेट में है. लेकिन क्या इस संस्कृति पर अब ग्रहण लगने वाला है? ऐसा मद्रास हाई कोर्ट की एक टिप्पणी के बाद कहना पड़ रहा है.
मद्रास हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप पर एक अहम टिप्पणी की है. यही टिप्पणी ही देश में बिन बुलाई विदेशी संस्कृति के लिए खतरा माना जा रहा है. दरअसल, मद्रास हाई कोर्ट ने भारतीय संस्कृति में लिव रिलेशनशिप जैसी संस्कृति पर चिंता जताई है. जस्टिस एस. श्रीमाथी ने मदुरै बेंच ने एक फैसले में यह कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं को पत्नी का दर्जा देकर कानूनी और आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए. कोर्ट ने यह बयान महिलाओं को शारीरिक शोषण और मानसिक आघात से बचाने के खयाल से दिया है. कोर्ट का कहना है कि लड़कियां खुद को मॉडर्न समझकर ऐसे रिश्ते तो स्वीकार कर लेती हैं, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें यह एहसास होता है कि यह रिश्ता शादी जैसी सुरक्षा नहीं दे रहा है. जब तक यह अहसास होता है, वक्त हाथ से निकल चुका होता है और वे मानसिक और वित्तीय संकट की शिकार भी हो चुकी हैं.
कोर्ट ने इस मामले में सुनाया है यह फैसला
मद्रास हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप के जिस मामले में यह टिप्पणी की है वह ऐसे ही रिलेशन में एक व्यक्ति की अग्रिम जमानत को लेकर था. केस इस प्रकार है कि आरोपी ने एक महिला से शादी का वादा करके उससे शारीरिक संबंध बनाये और फिर शादी से मुकरने गया. इतना ही नहीं, आरोपी का महिला पर यह आरोप था कि उसका‘चरित्र अच्छा नहीं है इसलिए उसने उसे छोड़ दिया. इसी केस में आरोपी ने कोर्ट में जमानत की अर्जी लगायी थी. लेकिन कोर्ट ने उसकी जमानत अर्जी को खारिज कर दिया. जस्टिस श्रीमाथी ने फैसला सुनाते हुए कड़ी आपत्ति जताते हुए टिप्पणी कि कि “लड़के खुद को मॉडर्न मानकर लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं और बाद में लड़कियों के चरित्र पर सवाल उठाते हैं.' साथ ही कोर्ट ने यह चेतावनी दी कि अगर शादी संभव नहीं है तो पुरुषों को कानूनी प्रावधानों का सामना करना पड़ेगा.
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