न्यूज 11 भारत/बिहार डेस्क
रमण कुमार/मधेपुरा: मधेपुरा से आई इन तस्वीरों को गौर से देखिए। यह कोई खेत नहीं, बल्कि गांव का वो रास्ता है, जिससे होकर करीब 150 घरों के लोग रोज गुजरते हैं। लेकिन सड़क की जगह यहां कीचड़ है।जब सड़क के लिए दिए गए आवेदन और शिकायतों के बाद भी समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो ग्रामीणों ने विरोध का अनोखा तरीका अपनाया।कीचड़ भरे रास्ते पर ही धान रोप दिया।महिलाएं, युवा और बच्चे सड़क पर उतरे और प्रशासन के खिलाफ अपनी नाराजगी जताई। इस दौरान ग्रामीणों ने नारे लगाए रोड नहीं तो वोट नहीं।
ग्रामीणों के मुताबिक इस वार्ड में करीब 150 घर हैं और यहां बड़ी संख्या में महादलित परिवार भी रहते हैं। इन परिवारों के लिए आने-जाने का रास्ता आज भी बड़ी समस्या बना हुआ है।
बारिश शुरू होते ही परेशानी और बढ़ जाती है। रास्ते पर पानी जमा हो जाता है और चारों तरफ कीचड़ फैल जाता है।
लोगों को इसी रास्ते से बाजार जाना है, बच्चों को स्कूल जाना है और जरूरत पड़ने पर मरीजों को भी बाहर ले जाना है।
लेकिन खराब रास्ते के कारण हर कदम मुश्किल हो जाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण की मांग को लेकर कई बार बार अधिकारियों से गुहार लगाई गई। जिला पदाधिकारी को दिए गए आवेदन में अरविंद कुमार ने वार्ड की समस्या का जिक्र करते हुए सड़क निर्माण की मांग की है। आवेदन में अनुमंडल पदाधिकारी के आदेश और अंचलाधिकारी की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया है। ग्रामीणों का दावा है कि अधिकारियों के स्तर पर कार्रवाई और रिपोर्ट का जिक्र होने के बावजूद जमीन पर सड़क का निर्माण नहीं हुआ। यही वजह है कि अब ग्रामीणों का गुस्सा खुलकर सामने आ रहा है।
ग्रामीणों ने विरोध के लिए ऐसा तरीका चुना, जिसने सड़क की बदहाली को सबके सामने ला दिया। जिस रास्ते पर उन्हें चलना था, उसी कीचड़ में ग्रामीणों ने धान के पौधे रोप दिए।
महिलाएं भी बड़ी संख्या में विरोध में शामिल हुईं। युवाओं ने नारेबाजी की और बच्चों ने भी इस प्रदर्शन में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। ग्रामीणों का कहना था कि अगर रास्ता सड़क नहीं बन सकता, तो कम से कम इसे खेत ही मान लिया जाए।
ग्रामीणों की सबसे बड़ी शिकायत यही है कि सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए उन्हें बार-बार अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
उनका कहना है कि बरसात के दिनों में सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को होती है।
कई बार कीचड़ में लोग फिसलकर गिर भी जाते हैं।
मरीजों और गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक ले जाने में भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
इस पूरे मामले में ग्रामीणों ने अब प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग की है। उनकी मांग है कि मौके की जांच कराकर जल्द से जल्द आने-जाने के लिए सड़क का निर्माण कराया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें कोई बड़ी सुविधा नहीं चाहिए। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि उनके घरों तक पहुंचने के लिए एक ऐसा रास्ता हो, जिस पर बारिश के मौसम में भी सुरक्षित तरीके से चला जा सके। लेकिन अब इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी लेना शुरू कर दिया है। सड़क की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों ने साफ शब्दों में कहा रोड नहीं तो वोट नहीं।’ यानी ग्रामीणों का गुस्सा अब सिर्फ प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले चुनाव में इसका असर डालने की चेतावनी भी दी जा रही है।
धान रोपकर ग्रामीणों ने अपने विरोध का तरीका जरूर बदल दिया है, लेकिन उनकी मांग बिल्कुल साफ है। उन्हें कागज पर आदेश नहीं, जमीन पर सड़क चाहिए।
अब सवाल प्रशासन से है। करीब 150 घरों की इस आबादी को आखिर कब मिलेगा एक पक्का और सुरक्षित रास्ता? सड़क की जगह कीचड़ में धान और ग्रामीणों की जुबान पर एक ही नारा ‘रोड नहीं तो वोट नहीं।’ अब देखना होगा कि ग्रामीणों का ये विरोध प्रशासन को जगाता है या फिर अगली बारिश में भी ये रास्ता सड़क के बजाय खेत ही नजर आएगा।