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रांची/डेस्क: ACB की लंबित प्रारंभिक जांच पर झारखंड हाईकोर्ट सख्त नज़र आ रही है. स्वतः संज्ञान से दर्ज जनहित याचिका पर आज हाई कोर्ट में सुनवाई हुई. कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को प्रारंभिक जांच के नाम पर अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता. प्रारंभिक जांच किसी भी हाल में 3 महीने में पूरी होनी चाहिए. जांच में आरोप सही मिले तो आगे की कार्रवाई हो, नहीं तो मामला समाप्त होना चाहिए. हाईकोर्ट ने ACB से लंबित प्रारंभिक जांच का पूरा आंकड़ा मांगा है. कोर्ट ने पूछा कि कितनी जांच लंबित, किस स्तर पर है और देरी का कारण क्या है ? राज्य सरकार ने लंबित मामलों का चार्ट और आंकड़े दाखिल किए. ACB की और से कोर्ट को बताया गया कि अब तक 173 मामले लंबित हैं. कई मामलों में ASP स्तर की जांच पूरी कर ली गयी है. सरकार या कैबिनेट स्तर पर अनुमति लंबित है.
कोर्ट ने पूछा कि जांच पूरी होने के बाद अनुमति में वर्षों का समय क्यों लग रहा है? अनुमति की प्रक्रिया भी अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रह सकती. कोर्ट ने कहा कि बनता है तो कार्रवाई हो, नहीं बनता तो जांच में वर्षों तक न रखा जाए. कोर्ट ने लंबित मामलों की स्थिति और विशिष्ट जानकारी मांग. पक्षकारों को बहस का ब्रीफ सिनॉप्सिस दाखिल करने का निर्देश दिया गया. मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर को निर्धारित की है. राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता रोहितश्य रॉय और अधिवक्ता विभोर मयंक ने पक्ष रखा. मामले में एमिकस क्यूरी के रूप में अधिवक्ता ऋतु कुमार ने पक्ष रखा. वहीं हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता राजीव कुमार और अधिवक्ता नवीन कुमार ने पक्ष रखा. मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायाधीश राजेश शंकर की खंडपीठ में हुई.
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