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रांची/डेस्क: झारखंड में परिसीमन के प्रश्न को लेकर जिस प्रकार की राजनीति की जा रही है, वह राज्य के सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक व्यवस्था दोनों के लिए चिंताजनक है. वर्ष 2008 में जब पूरे देश में परिसीमन की प्रक्रिया लागू की जा रही थी, उस समय झारखंड को इससे अलग रखने का निर्णय लिया गया. यह निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं था, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव पड़े. इससे राज्य की लोकतांत्रिक संरचना, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और विकास की गति प्रभावित हुई.
झारखंड राज्य का गठन इस विश्वास के साथ हुआ था कि यह प्रदेश भारतीय संविधान की मूल भावना के अनुरूप आगे बढ़ेगा तथा यहां रहने वाले सभी वर्गों को समान अवसर और न्याय मिलेगा. किंतु 2008 के परिसीमन की प्रक्रिया से झारखंड को अलग रखना एक ऐसी ऐतिहासिक भूल साबित हुई, जिसने राज्य के संतुलित राजनीतिक विकास को बाधित किया.
आज एक बार फिर परिसीमन को लेकर विवाद खड़ा करने तथा इसे रोकने की कोशिशें दिखाई दे रही हैं. कांग्रेस और उनके नेता इस मुद्दे को सामाजिक विभाजन का माध्यम बनाने का प्रयास कर रहे हैं उनके कार्यकारी अध्यक्ष इस मुद्दे पर समाज को बांटने का काम शुरू कर चुके हैं. यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है. झारखंड का इतिहास इस बात का साक्षी है कि आदिवासी और गैर-आदिवासी समाज के बीच खींची गई विभाजन रेखा ने लंबे समय तक (1947 से 2000) अलग राज्य की मांग को कमजोर किया था. जब सर्वसमाज एकजुट हुआ, तभी श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी और लालकृष्ण आडवाणी जी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने झारखंड राज्य के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया.
आज आवश्यकता इस बात की है कि परिसीमन जैसे संवैधानिक विषय को राजनीतिक लाभ और सामाजिक विभाजन का हथियार न बनाया जाए. झारखंड के सर्वांगीण विकास, लोकतांत्रिक सशक्तिकरण और सामाजिक समरसता में विश्वास रखने वाली सभी राष्ट्रवादी एवं सकारात्मक शक्तियों को एकजुट होकर ऐसे प्रयासों का विरोध करना चाहिए.
मैं राज्य सरकार एवं भारत सरकार से आग्रह करता हूं कि इस प्रकार की विभाजनकारी गतिविधियों पर सतर्क दृष्टि रखें और यह सुनिश्चित करें कि झारखंड संविधान एवं राष्ट्र की मुख्यधारा से और अधिक मजबूती के साथ जुड़ा रहे. राज्य में अविश्वास और टकराव का वातावरण बनने से रोकना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है.
झारखंड में रहने वाले प्रत्येक नागरिक- चाहे वह अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग, सामान्य वर्ग अथवा अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित हो-उसे संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का समान रूप से लाभ मिलना चाहिए. किसी भी वर्ग के अधिकारों की उपेक्षा या हनन लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत होगा.
मैं झारखंडवासियों से अपील करता हूं कि वे इस विषय पर गंभीरता से विचार करें, तथ्यों को समझें और राज्य की एकता, सामाजिक समरसता तथा विकास के पक्ष में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाएं. एक मजबूत, समरस और विकसित झारखंड ही हम सभी का साझा लक्ष्य होना चाहिए.
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