चर्चित पुलिस-मुठभेड़ मामला: झारखंड हाई कोर्ट से नक्सली लक्ष्मण गंझू उर्फ कोहराम जी को मिली जमानत

नक्सली लक्ष्मण गंझू

चर्चित पुलिस-मुठभेड़ मामला: झारखंड हाई कोर्ट से नक्सली लक्ष्मण गंझू उर्फ कोहराम जी को मिली जमानत

झारखंड उच्च न्यायालय ने वर्ष 2002 के एक बेहद चर्चित और भीषण नक्सली हमले से जुड़े मामले में आरोपी लक्ष्मण गंझू उर्फ कोहराम जी को बड़ी राहत देते हुए जमानत प्रदान कर दी है.

चर्चित पुलिस-मुठभेड़ मामला झारखंड हाई कोर्ट से नक्सली लक्ष्मण गंझू उर्फ कोहराम जी को मिली जमानत

न्यूज़11 भारत 
रांची/डेस्क:
झारखंड उच्च न्यायालय ने वर्ष 2002 के एक बेहद चर्चित और भीषण नक्सली हमले से जुड़े मामले में आरोपी लक्ष्मण गंझू उर्फ कोहराम जी को बड़ी राहत देते हुए जमानत प्रदान कर दी है. हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई के बाद आरोपी की क्रिमिनल अपील को स्वीकार कर लिया है.

निचली अदालत का आदेश निरस्त
झारखंड हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति एके राय की खंडपीठ (Division Bench) ने इस मामले पर सुनवाई की. सुनवाई के दौरान अदालत ने चतरा के प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (1st Additional Sessions Judge, Chatra) द्वारा दिए गए पुराने आदेश को त्रुटिपूर्ण माना. निचली अदालत ने 19 मार्च 2026 को लक्ष्मण गंझू की जमानत याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया था, जिसे अब हाई कोर्ट की खंडपीठ ने रद्द (Set Aside) कर दिया है.

कड़े प्रतिबंधों और शर्तों के साथ रिहाई का निर्देश
हाई कोर्ट ने आरोपी लक्ष्मण गंझू को ₹10,000 के निजी मुचलके (Personal Bond) तथा इसी समान राशि के दो स्थानीय जमानतदारों (S sureties) को प्रस्तुत करने पर जेल से रिहा करने का निर्देश दिया है. इसके साथ ही कोर्ट ने आरोपी पर कुछ सख्त शर्तें भी लागू की हैं:

नियमित उपस्थिति: आरोपी को बिना किसी ठोस या पर्याप्त कारण के निचली अदालत (Trial Court) की हर एक सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहना होगा.

मुकदमे में सहयोग: मुकदमे की समाप्ति तक वह किसी भी प्रकार से न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित या बाधित करने का प्रयास नहीं करेगा.

क्या था वर्ष 2002 का मुख्य मामला?
यह पूरा विवाद चतरा जिला अंतर्गत हुए एक बड़े उग्रवादी हमले से जुड़ा है. अभियोजन पक्ष (Prosecution) के अनुसार, वर्ष 2002 में पुलिस बल और प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन के सदस्यों के बीच भीषण मुठभेड़ हुई थी. इस हमले में कई पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे और बड़ी संख्या में जवान गंभीर रूप से घायल हुए थे. नक्सलियों ने घात लगाकर किए गए इस हमले के बाद सरकारी हथियार और भारी मात्रा में गोला-बारूद भी लूट लिए थे. इस घटना के बाद चतरा सदर थाने में कांड संख्या 24/2002 के तहत विभिन्न गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था.

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता लक्ष्मण गंझू की ओर से पैरवी कर रहे कानूनी वकील ने दलील दी कि मूल एफआईआर (FIR) में उनका नाम सीधे तौर पर शामिल नहीं था. इस मामले के एक अन्य सह-अभियुक्त 'प्यारे खान' द्वारा पुलिस हिरासत में दिए गए कथित स्वीकारोक्ति बयान (Confessional Statement) के आधार पर बाद में लक्ष्मण गंझू का नाम घसीटा गया. इसके अतिरिक्त, वकील ने कोर्ट को बताया कि आरोपी 13 सितंबर 2022 से लगातार न्यायिक हिरासत (Judicial Custody) में जेल में बंद है और इसी केस के कई अन्य मुख्य सह-अभियुक्तों को पूर्व में ही हाई कोर्ट से नियमित जमानत मिल चुकी है.

राज्य सरकार की ओर से पेश हुए सरकारी अधिवक्ता ने इस जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया. सरकार ने कोर्ट के सामने तर्क रखा कि आरोपी लक्ष्मण गंझू एक आदतन अपराधी है और उसके खिलाफ विभिन्न थानों में कम से कम 6 अन्य आपराधिक मामले दर्ज हैं, इसलिए उसे राहत नहीं दी जानी चाहिए.

हाई कोर्ट का निष्कर्ष
हाई कोर्ट की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें, केस डायरी और कानूनी नज़ीरों का गहराई से अवलोकन किया. कोर्ट ने पाया कि मामले में आरोपी की कथित संलिप्तता का तरीका सीधे साक्ष्यों पर आधारित न होकर सह-अभियुक्त के बयान पर निर्भर है. इसके अलावा, जब इसी प्रकृति के अन्य सह-अभियुक्तों को पहले ही उच्च न्यायालय से जमानत की राहत मिल चुकी है, तो समानता (Parity) के सिद्धांत के आधार पर अपीलकर्ता को भी जमानत का लाभ दिया जाना न्यायसंगत है.
 

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